आधार की अनिवार्यता को लेकर सु्प्रीम कोर्ट में 9 जजों की संविधान बैंच सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सवाल किया कि क्या कोई व्यक्ति अपने 'राइट टु प्राइवेसी' का सरेंडर कर सकता है? कोर्ट ने पूछा कि क्या 'राइट टु प्राइवेसी' का मतलब 'अकेले छोड़ दिए जाने का अधिकार' है?'
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से गोपाल सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि स्वतंत्रता और समानता के बिना प्राइवेसी संभव नहीं। प्रस्तावना में सोचने की आजादी का अधिकार है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सोली सोरबाजी ने कहा कि प्राइवेसी इंसानी वजूद का अटूट हिस्सा है। उन्होंने कहा कि संविधान में इसका जिक्र न होने का मतलब यह नहीं कि ये हक नहीं है। सविंधान में प्रेस की आजादी भी नहीं है, प्रेस की आजादी बोलने की आजादी का हिस्सा है।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने आधार की अनिवार्यता को लेकर 9 जजों की बैंच को बुधवार को सुनवाई करने का आदेश दिया था। इस मामले पर आई याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं ने आधार योजना की वैधता को चुनौती देने के साथ निजता के अधिकार का उल्लंघन बताया है।
सुप्रीम कोर्ट की संविधानिक पीठ में मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर, न्यायाधीश जे चेमलेश्वर, एमए बोब्दे, डीआई चंद्रचूड़ और एस अब्दुल नजीर हैं। इस महीने की 12 तारीख को अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और वरिष्ठ वकील श्याम दीवान द्वारा संयुक्त रूप से मामलों को उठाने के बाद आधार से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट एक पीठ बनाने पर सहमत हुआ था।
ये दोनों वकील उन याचिकाओं के संबंध में पेश हुए थे जिनमें विभिन्न जनहित योजनाओं के लिए आधार को अनिवार्य करने के सरकार के कदम को चुनौती दी गई है।