सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजारा भत्ता या स्थायी गुजारा भत्ता दंडनीय नहीं होना चाहिए। यह पत्नी के लिए एक सभ्य जीवन स्तर सुनिश्चित करने के उद्देश्य से होना चाहिए। शीर्ष अदालत ने पिछले नौ साल से अलग रह रहे पति-पत्नी की शादी को भंग करते हुए यह टिप्पणी की।
जस्टिस विक्रम नाथ और प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने पति को एकमुश्त निपटान के रूप में पत्नी को दो करोड़ रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए 2015 में हुए विवाह को भंग कर दिया क्योंकि दोनों पक्ष एक साल से भी कम समय तक साथ रहे थे।
पीठ ने कहा, इस न्यायालय ने पिछले कई वर्षों में कई निर्णयों में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विवाह को भंग करने के लिए अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल किया है। इस शक्ति का प्रयोग न्यायालय ने तब किया, जब उसे लगा कि विवाह समाप्त हो चुका है, अव्यावहारिक है, सुधार से परे है, भावनात्मक रूप से नष्ट हो चुका है, भले ही मामले के तथ्यों में कानून में दिए गए तलाक के लिए कोई आधार नहीं बनता हो। यह मामला गौतमबुद्धनगर से जुड़ा है। इसमें अलग रही पत्नी ने मामले को निपटाने के लिए करोड़ों रुपये की मांग की थी।
मामले में एक फर्म में एचआर हेड के रूप में काम करने वाली पत्नी ने एकमुश्त निपटान के रूप में 5-7 करोड़ रुपये मांगे, जबकि एक निजी बैंक में वाइस प्रेसिडेंट के रूप में काम करने वाले पति ने सिर्फ 50 लाख रुपये देने की इच्छा जताई। दोनों पक्षों की संपत्ति, आय और देनदारियों पर गौर करने के बाद पीठ ने कहा कि पत्नी द्वारा की गई मांग असाधारण रूप से अधिक है लेकिन साथ ही पति द्वारा पेश की गई राशि रखरखाव के व्यापक विचार के लिए अपर्याप्त है। कोर्ट ने पक्षों की सामाजिक और वित्तीय स्थिति, उनके वर्तमान रोजगार के साथ-साथ भविष्य की संभावनाओं, जीवन स्तर और उनके दायित्वों, देनदारियों और अन्य खर्चों को ध्यान में रखते हुए पति द्वारा भुगतान किए जाने वाले स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में दो करोड़ रुपये तय किए।