याचिका में कहा गया था कि क्या अपराध प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 354 (5) के तहत अनुपालन संभव है, जबकि एक दोषी को सजा से पहले किसी विशेष अवधि के लिए कारावास की सजा से गुजरना पड़ता है और दोषी मानते हुए उसे फांसी देते हुए तब तक गर्दन से लटकाया जाता है, जब तक कि वह मर न जाए। इसके बाद भी उसका शरीर लटकता रहता है जिससे शरीर का अनादर होता है और इस प्रकार यह सजा धारा 354 (5) के दायरे बाहर हो जाती है।
फांसी देने वाला किसी की हत्या तो नहीं कर रहा
याचिका में कहा गया था कि क्या दोषी को फांसी देने वाला व्यक्ति सरकारी कर्तव्य कर रहा है या किसी व्यक्ति की हत्या कर रहा है? क्या राज्य किसी व्यक्ति को कर्तव्य निर्वहन में किसी अन्य व्यक्ति को मृत्यु देने का अधिकार दे सकता है? क्या राज्य के पास किसी को ऐसा अधिकार देने की शक्ति है? यदि हां तो वह विशेष प्रावधान क्या है जो किसी व्यक्ति को मृत्यु को प्रशासित करने का अधिकार देता है, विशेष रूप से जब जीवन का अधिकार संविधान में सबसे अहम है।
सुप्रीम कोर्ट बरकरार रख चुका है वैधता
याचिका में यह भी कहा गया है कि फांसी की सजा 22 जनवरी, 1947 को अपनाए गए संविधान की प्रस्तावना की भावना के भी खिलाफ है, जिसमें जीवन और स्वतंत्रता के बारे में बात की गई है। जगमोहन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एआईआर 1973, एससी 947 मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने मृत्युदंड की सांविधानिक वैधता को बरकरार रखा गया था।