सुप्रीम कोर्ट ने मूक जानवरों के कल्याण को बेहद अहम बताया। इसके साथ शीर्ष कोर्ट ने केरल सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्य के सबसे ऊंचे हाथी राम को अपने कब्जे में ले और उसे किसी उचित पुनर्वास केंद्र में रखे।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि 10.53 फीट ऊंचे रामन का व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल किया गया है और उसे शोभायात्राओं तथा अनुष्ठानों में भी शामिल किया जाता रहा है। बेंच ने कहा, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि रामन का व्यावसायिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया, जो केरल का सबसे ऊंचा हाथी भी है। यह तब हुआ जब ऐसे इस्तेमाल पर रोक लगाने का आदेश पहले से मौजूद था और इस कोर्ट के सामने इसका पालन करने का आश्वासन भी दिया गया था।
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि यदि वह (राज्य सरकार) इस तरह की अवहेलना को नजरअंदाज करती है, तो मूक प्राणियों के प्रति अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर पाएगी। कोर्ट ने कहा कि वह ऐसे मामलों में केवल दर्शक बनकर नहीं रह सकती, खासकर जब मामला उन जानवरों से जुड़ा हो जो अपनी बात खुद नहीं रख सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कृष्णनकुट्टी ने अदालत को दिए गए आश्वासन का जानबूझकर उल्लंघन किया है। विवादित वसीयत के आधार पर हाथी की देखरेख अपने पास रखने वाले कृष्णनकुट्टी को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया गया और उन पर 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि रामन की हिरासत को लेकर उसका यह आदेश फिलहाल अस्थायी है और अंतिम फैसला बाद में सुनाया जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि केरल सरकार हाथी की देखभाल अपने खर्च पर कर सकती है। इसके लिए वह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत आवश्यक प्रशासनिक आदेश जारी कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के अधिकारियों को अवमानना के मामले से राहत देते हुए कहा कि उन्होंने हाथी का चिकित्सीय परीक्षण कराने का प्रयास किया था। बेंच जयकृष्ण मेनन की ओर से दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मेनन का दावा है कि यह हाथी माता अमृतानंदमयी मठ का है और उसकी देखभाल के लिए उसे अस्थायी रूप से कृष्णनकुट्टी को सौंपा गया था।
दूसरी ओर, कृष्णनकुट्टी का कहना है कि उपहार संबंधी दस्तावेजों के जरिये रामन कानूनी रूप से उन्हें सौंपा गया था और पिछले 10 से 12 वर्षों से वही उसकी देखभाल और पालन-पोषण कर रहे हैं।