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SC: सुप्रीम कोर्ट का अधिकारियों को निर्देश, इलाहबाद हाईकोर्ट परिसर से तीन महीने के अंदर हटाएं मस्जिद

Mon, 13 Mar 2023 03:25 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

वक्फ मस्जिद हाईकोर्ट और यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने नवंबर 2017 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मस्जिद को परिसर से बाहर ले जाने के लिए तीन महीने का समय दिया था।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर में स्थित मस्जिद को हटाया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद हटाने के हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए मस्जिद हटाने के लिए तीन महीने का समय दिया है। याचिकाकर्ता वक्फ मस्जिद को वैकल्पिक भूमि के लिए राज्य सरकार के समक्ष प्रतिवेदन की अनुमति भी दी।

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जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने सोमवार को याचिकाकर्ताओं से कहा, भूमि एक पट्टे की संपत्ति थी, जिसे खत्म कर दिया गया था। वे अधिकार के तौर पर इसे कायम रखने का दावा नहीं कर सकते। शीर्ष अदालत वक्फ मस्जिद हाईकोर्ट और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। 


इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को दी थी चुनौती
वक्फ मस्जिद हाईकोर्ट और यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने नवंबर 2017 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मस्जिद को परिसर से बाहर ले जाने के लिए तीन महीने का समय दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उनकी याचिका खारिज कर दी। 

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मस्जिद सरकारी पट्टे की भूमि पर स्थित
हालांकि, जस्टिस एमआर शाह और सीटी रविकुमार की बेंच ने याचिकाकर्ताओं को पास के क्षेत्र में वैकल्पिक भूमि के आवंटन के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को एक प्रतिनिधित्व देने की भी अनुमति दी। बेंच ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि भूमि एक सरकारी पट्टे की संपत्ति थी, जिसे समाप्त कर दिया गया था, और वे इसे जारी रखने के अधिकार के मामले के रूप में दावा नहीं कर सकते।    

वैकल्पिक भूमि के लिए दें प्रतिवेदन: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, याचिकाकर्ता चाहें तो वैकल्पिक भूमि की मांग के लिए राज्य सरकार को विस्तृत प्रतिवेदन दें। इस पर नियम के अनुसार विचार किया जा सकता है।

तो ढांचा गिराने का विकल्प खुला
पीठ ने कहा कि हम याचिकाकर्ताओं को विचाराधीन निर्माण को हटाने के लिए तीन महीने का समय देते हैं। यदि आज से तीन महीने की अवधि में निर्माण नहीं हटाया जाता है, तो हाईकोर्ट समेत अन्य प्राधिकार के लिए उसे हटाने या गिराने का विकल्प खुला रहेगा।

1950 के दशक से मौजूद है मस्जिद
मस्जिद की प्रबंधन समिति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि मस्जिद 1950 के दशक से वहां है और इसे बाहर ले जाने के लिए नहीं कहा जा सकता है। उन्होंने कहा, 2017 में सरकार बदल गई और सब कुछ बदल गया। नई सरकार के गठन के 10 दिन बाद एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की जाती है। हमें वैकल्पिक स्थान पर स्थानांतरित होने में कोई समस्या नहीं है, जब तक कि वे इसे हमें देते हैं। वहीं, हाईकोर्ट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि यह पूरी तरह धोखाधड़ी का मामला है। 
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शीर्ष अदालत ने इससे पहले पक्षकारों को इस बात पर आम सहमति बनाने का निर्देश दिया था कि मस्जिद को कहां स्थानांतरित किया जाना चाहिए।


आवासीय उद्देश्य के लिए था नवीनीकरण का आवेदन
हाईकोर्ट के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा, यह पूरी तरह से धोखाधड़ी का मामला है। दो बार नवीनीकरण के आवेदन आए और कोई सुगबुगाहट तक नहीं हुई कि मस्जिद का निर्माण किया गया था। इसका उपयोग जनता के लिए किया गया। नवीनीकरण की मांग करते हुए कहा, यह आवासीय उद्देश्यों के लिए आवश्यक है। केवल यह तथ्य कि वे नमाज पढ़ रहे हैं, इसे मस्जिद नहीं बना देगा। सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के बरामदे में सुविधा के लिए अगर नमाज की अनुमति दी जाए तो यह मस्जिद नहीं बन जाती।

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