सुप्रीम कोर्ट ने सड़क हादसों की वजह से तबाह होने वाले परिवारों को मुआवजा नहीं दिए जाने पर नाराजगी जताई है। कोर्ट में मामला उठा है कि आधे से ज्यादा पीड़ित ऐसे होते हैं जो कानूनी तौर पर वैध होते हैं फिर भी उन्हें मुआवजा नहीं दिया जाता है। दरअसल, सड़क हादसे की वजह से हर तीन में एक मौत हो जाने पर कोर्ट ने चिंता जताते हुए कई राज्यों को निर्देश दिए हैं कि वे इसके खिलाफ कारगर कदम उठाए।
कोर्ट ने दिल्ली, असम, नागालैंड, त्रिपुरा और दो दूसरे केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश जारी करते हुए ये फरमान दिया है कि वे सड़क हादसों से बचने के लिए सेफ्टी पॉलिसी लाए साथ ही पीड़ितों के मुआवजे दिए जाने के मामले को भी गंभीरता से ले। पॉलिसी तैयार करने की कोर्ट ने डेडलाइन अगले साल 31 मार्च तक रखी है।
कोर्ट के निर्देश उस वक्त सामने आए हैं जब साल 2014 में 139671 और 2015 में 146133 मौत सड़क हादसों की वजह से हुईं। कोर्ट में बताया गया कि इंशोयरेंस कंपनियों ने साल 2014-15 के दौरान करीब 11480 करोड़ का मुआवजा दिया, लेकिन आधे पीड़ितों को ये सुविधा नहीं मिल पाई क्योंकि उन्हें उनके दायित्वों का ज्ञान नहीं था।
मुआवजा दिए जाने में लापरवाही बरतने की शिकायत लेकर कोर्ट पहुंचे गौरव अग्रवाल की कई बातों पर कोर्ट ने सहमति जताई। अग्रवाल के मुताबिक सड़क की बुरी हालत के चलते ज्यादातर हादसे होते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि सड़कों की हालत सुधारना बेहद जरूरी है। इस पर जस्टिस मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता ने कहा कि सड़क सेफ्टी पर करोड़ों रुपये खर्चे जाते हैं, लेकिन हर साल हादसों की संख्या बढ़ती जा रही है।
कोर्ट ने कहा कि ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के दौरान लिया जाने वाला फाइन सड़कों को सुधारने के लिए इस्तेमाल होना चाहिए। इस बीच कोर्ट ने ट्रांसपोर्ट मंत्रालय को भी निर्देश देते हुए कहा कि मंत्रालय को कारगर कदम उठाने चाहिए। कोर्ट ने कहा कि मंत्रालय को रोड सेफ्टी ऑडिट का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि हादसे कम हो।