निजता के अधिकार को अत्यधिक जटिल मसला बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह जानना चाहा कि किसी व्यक्ति द्वारा खुद को गुमनाम रखना और अपनी पहचान को छुपाना, क्या निजता का हिस्सा हो सकता है।
गुरुवार को पूरे दिन चली सुनवाई में चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने कानूनी और विधायी पहलुओं पर विचार किया कि निजता केअधिकार को मूल अधिकार माना जा सकता है या नहीं?
पीठ ने निजता केअधिकार केपक्ष में पैरवी कर रहे वकीलों से पीठ ने कहा कि अगर हम निजता केअधिकार को मौलिक अधिकार करार देते हैं तो केंद्र सरकार को सबसे पहले इसे कानूनी अमलीजामा पहनाना होगा।
पीठ ने वकीलों से कहा, ‘राज्य को कानून और रेग्यूलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करना होगा लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर कोई व्यक्ति निजता का अधिकार को निजी कंपनियों या संस्था पर प्रभावी होने की बात कैसे करेगा क्योंकि मूल अधिकार तो राज्य केखिलाफ ही लागू हो सकता है।’
जवाब में वकीलों ने कहा कि ऐसे में व्यक्ति क्षतिपूर्ति के लिए संवैधानिक कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। इस पर पीठ ने कहा कि क्षतिपूर्ति ही एकमात्र विकल्प नहीं हो सकता जब किसी अधिकार को मौलिक अधिकार करार दिया गया हो।