अमेरिका के 10 सबसे बड़े बैंकों में 38.4 से 66.5 प्रतिशत जमा खातों का ही बीमा है। जबकि साल 2022 की तीसरी तिमाही तक भारतीय बैंकों में यह आंकड़ा 98 प्रतिशत मिला है। अमेरिका के प्रमुख बैंकों में जमा औसतन 50 से 55 प्रतिशत राशि का बीमा है, छोटे बैंकों में तो यह आंकड़ा महज 30 से 45 प्रतिशत ही है। इसके मुकाबले भारत में कुल जमा राशि में से ग्रामीण बैंकों में 82.9, सहकारी बैंकों में 66.5 और स्थानीय क्षेत्र बैंकों में 76.4 प्रतिशत जमा बीमित है।
भारतीय बैंकों की मजबूती और अमेरिकी बैंकों के खोखलेपन के यह खुलासे भारतीय स्टेट बैंक को जारी ताजा रिपोर्ट इकोरैप में सोमवार को किए गए। कहा गया, भारतीय बैंकों में जमा लोगों का पैसा अमेरिकी बैंकों के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित है।
रिपोर्ट में दावा है कि दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों (भारत के आरबीआई के समकक्ष) के लिए भारत का यह मॉडल 'कट-कॉपी-पेस्ट' करने योग्य है। भारत का विदेशी ऋणियों पर इमीडिएट काउंटर-पार्टी के तौर पर 10,420 करोड़ डॉलर और गारंटर के रूप में 8,150 करोड़ डॉलर बकाया है। प्रमुख देशों में यह सबसे कम है। अमेरिका में यह क्रमश: 4,34,500 करोड़ डॉलर व 4,29,630 करोड़ डॉलर है।
- भारत: 98% जमा खातों का बीमा है 2022 की तीसरी तिमाही तक
- अमेरिका: 66.5% जमा खातों का ही बीमा
हालात इतने विकट
अमेरिकी सिलिकॉन वैली बैंक में महज 10.7% और फाइनेंशियल बैंक में 13.6% जमा बीमित था।
भारतीय बैंकों पर विदेशी दावों और घरेलू दावों का अनुपात कम है। बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली बेहद अनुशासित है और भारत से कोई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट दुनिया के लिए खड़ा नहीं हो सकता। भारत में किसी वित्तीय संकट का खतरा अमेरिका या ब्रिटेन से ही आ सकता है।
-सौम्य कांति घोष, समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार, एसबीआई
प्रमुख 10 अमेरिकी बैंकों में कितने खातों का जमा बीमित
स्टेट स्ट्रीट कॉरपोरेशन 38.4%
द बैंक ऑफ न्यूयॉर्क मेलन कॉर्प 48.6%
कैपिटल वन फाइनेंशियल कॉर्प 62.4%
ट्रूइस्ट फाइनेंशियल कॉर्प 56%
द पीएनसी फाइनेंशियल सर्विसेज 55.3%
यूएस बैनकॉर्प 51.5%
वैल्स फार्गो एंड कंपनी 55.6%
सिटी ग्रुप इंक 49.5%
बैंक ऑफ अमेरिका कॉर्प 66%
जेपी मॉर्गन चेस एंड कंपनी 57.3%
यूरोपीय सेंट्रल बैंक : गलत समय पर गलत कदम उठाने का महारथी
रिपोर्ट में लिखा गया यूरोप के 20 से ज्यादा देशों में बढ़ती महंगाई रोकने के लिए यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी) ने हाल में ब्याज में 0.50 बेसिस पॉइंट का इजाफा किया, यह प्रभावशाली कदम नहीं था।
- ईसीबी के निर्णय बिना किसी समन्वय के लिए गए। अक्तूबर 2006 से मार्च 2007 में जब महंगाई 0.10 से 0.30 बीपीएस बढ़ी, ईसीबी ने ब्याज में 0.75 बीपीएस वृद्धि की। अगस्त 2007 से जून 2008 में महंगाई 40 बीपीएस बढ़ी तो ईसीबी ने ब्याज में 25 बीपीएस की ही वृद्धि की।
- ताजा मामले में तो महंगाई 20 बीपीएस के नियंत्रित स्तर पर थी, फिर भी ईसीबी ने 5 महीने में 200 बीपीएस वृद्धि कर दी। महंगाई रोकने के बजाय, उसका जोर वित्तीय स्थिरता पर होना चाहिए था।
इस तरह भारी पड़े कदम
- ईसीबी के निर्णयों से ऋण महंगे हुए। इससे उद्योग चलाना महंगा हुआ। नागरिकों ने वस्तुओं का उपभोग घटाया, निजी उपभोग 0.9 प्रतिशत गिरा।
- यूरोपीय क्षेत्रों में अर्थव्यवस्था 2022 की चौथी तिमाही में थमी रही। निवेश 3.6 प्रतिशत ही बढ़े तो वहीं रोजगार केवल 0.3 प्रतिशत बढ़ा।