जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक राज्य में विधानसभा भंग होने के बाद से ही लगातार फ्रंट फुट पर जाकर खेल रहे हैं। उनकी सक्रियता यह साबित कर रही है कि इस संवेदनशील राज्य में पिछले कई दशकों से जितनी भी सरकारें आईं या जो भी नौकरशाह राज्यपाल रहे, उन्होंने तमाम बुनियादी समस्याओं को हल करने की दिशा में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। जिसकी वजह से अलगाववाद और आतंकवाद को जमकर हवा मिली।
निर्वाचित सरकारों की दिलचस्पी अलगाववाद की आड़ में अपनी सियासी रोटियां सेंकने और केंद्र से ज्यादा से ज्यादा धन लेने में रही तो नौकरशाह राज्यपालों ने राज्य को सिर्फ एक सुरक्षा खतरे के रूप में देखकर इसे पूरी तरह सुरक्षा बलों और फौज के आसरे छोड़ दिया। लेकिन एक राजनीतिक सोच वाले राज्यपाल के रूप में मलिक ने न सिर्फ राजभवन के दरवाजे हर आम खास के लिए खोल दिए, बल्कि कश्मीर में पहले मल्टीप्लेक्स की शुरुआत, खेल अकादमियों को प्रोत्साहन, राज्य के बाहर पढ़ने वाले कश्मीरी छात्रों की सुरक्षा और समस्याओं के समाधान के लिए देश के 11 विश्वविद्यालयों में संपर्क अधिकारियों की नियुक्ति जैसे कई काम भी किए।