मलिक के मुताबिक उनका कश्मीर से पुराना नाता है और राज्य के हर राजनीतिक दल के नेताओं से उनके निजी रिश्ते बेहद मधुर हैं इसलिए उन्हें उम्मीद है कि राज्य के विकास और अमन बहाली में उन्हें सबका सहयोग मिलेगा।
मलिक के अलावा अटल बिहारी वाजपेयी के बेहद विश्वासपात्र लालजी टंडन को बिहार का राज्यपाल बनाकर सरकार ने यह संदेश दिया है कि भले ही वाजपेयी अब इस संसार में नहीं हैं लेकिन उनके करीबियों के मान सम्मान का पूरा ख्याल रखा जाएगा।
बेबी रानी मौर्य को उत्तराखंड का राज्यपाल बनाकर उत्तर प्रदेश में पिछड़ों को साधा गया है जबकि कप्तान सिंह सोलंकी को हरियाणा से त्रिपुरा भेजा गया और सत्यदेव नारायण आर्य को हरियाणा का राज्यपाल बनाया गया। जबकि गंगा प्रसाद सिक्किम और तथागत राय को मेघालय का राज्यपाल बनाकर क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की गई है।
मलिक की नियुक्ति से एक बात और साफ हो जाती है कि केंद्र सरकार और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कश्मीर को अब सिर्फ नौकरशाहों और सुरक्षा विशेषज्ञों के भरोसे ही छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं। इसीलिए करीब तीन दशक के बाद किसी खांटी राजनीतिक व्यक्ति को राज्य की कमान तब सौंपी गई है जब जम्मू और कश्मीर में राज्यपाल शासन है।
मलिक के पूर्ववर्ती राज्यपालों में एल.के.झा, जनरल(रि) के.वी.कृष्णाराव, जगमोहन, गिरीशचंद्र सक्सेना, ले.जनरल (रि) एस.के, सिन्हा और एन एन वोरा की पृष्ठभूमि गैर राजनीतिक थी। जहां झा, जगमोहन और वोरा पूर्व प्रशासक थे, वहीं गिरीशचंद्र सक्सेना उर्फ गैरी सक्सेना भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के प्रमुख रह चुके थे। जबकि राव और सिन्हा सेना के शीर्ष अधिकारी रहे थे।
सत्यपाल मलिक मूल रूप से समाजवादी और लोकदल की धारा के राजनेता रहे हैं। एक समय वह चौधरी चरण सिंह के बेहद भरोसेमंद नेता थे। आपातकाल में जेल में भी रहे लेकिन बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। कांग्रेस के बाद वह समाजवादी पार्टी और अजित सिंह के राष्टीय लोकदल में भी रहे और बाद में भाजपा में शामिल हो गए।
भाजपा में मलिक को पहले उत्तर प्रदेश का उपाध्यक्ष फिर भाजपा किसान प्रकोष्ठ का अध्यक्ष बनाया गया और बाद में उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन पर भरोसा जताकर पहले बिहार और अब जम्मू कश्मीर का राज्यपाल
बनाया है।
राजीव गांधी के खिलाफ जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बगावत करके कांग्रेस छोड़ी तो उनके साथ कांग्रेस छोड़ने वालों में अरुण नेहरू, आरिफ मोहम्मद खान, मुफ्ती सईद और सत्यपाल मलिक भी थे। 1989 के लोकसभा चुनावों में मुफ्ती मोहम्मद सईद को मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़वाने वाले सत्यपाल मलिक ही थे। तब से ही उनके और मुफ्ती के बहुत करीबी रिश्ते रहे हैं। मुफ्ती सईद और सत्यपाल मलिक दोनों ही विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में मंत्री रहे हैं।
तब मुफ्ती गृह मंत्री थे। इसके अलावा सत्यपाल मलिक समाजवादी नेता जार्ज फर्नाडीस के भी काफी करीब रहे हैं और जार्ज के साथ भी उन्होंने कश्मीर को बहुत नजदीक से समझा था। जब जार्ज विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में मंत्री थे, तब केंद्र क तरफ से कश्मीर के मामलों में वही पहल करते थे और मलिक उनके सहयोगी थे।
कांग्रेस में रहने की वजह से मलिक के गुलाम नबी आजाद से भी अच्छे रिश्ते हैं और साथ ही नेशलन कांन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारुख अब्दुल्ला के साथ भी मलिक की अच्छी दोस्ती है। मलिक को भरोसा है कि उनके ये पुराने रिश्ते अब काम आएंगे।