सतपाल महाराज ने उत्तराखंड से राज्यसभा उम्मीदवार बनने से इंकार कर भाजपा आलाकमान के मंसूबे पर पानी फेर दिया है। सूबे की एकमात्र सीट से महाराज को उम्मीदवार बनाकर पार्टी आलाकमान की रणनीति मुख्यमंत्री हरीश रावत के सामने दोबारा से चुनौती पेश करने की थी। बताया जा रहा है कि कांग्रेस में महाराज समर्थक विधायकों की संख्या अब भी 5-6 के करीब है।
भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि बहुमत परिक्षण के वक्त महाराज समर्थक विधायक बेशक रावत के साथ खड़े रहे। मगर महाराज का चेहरा सामने आने से वे रावत का दामन छोड़ सकते हैं। लेकिन महाराज ने उम्मीदवारी से इंकार कर पार्टी रणनीतिकारों के मंसूबों पर पानी फेर दिया है। सूत्र बताते हैं कि राज्य प्रभारी समेत पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने मामले में महाराज से बातचीत की थी। लेकिन महाराज ने इनकार कर दिया। महाराज अभी किसी विवाद की राजनीति में नहीं पड़ना चाहते हैं।
चंद दिनों पहले ही सूबे के राजनीतिक ड्रामे को लेकर भाजपा को भारी फजीहत झेलनी पड़ी थी। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने का दांव केंद्र को उलटा पड़ा था। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर हुए बहुमत परिक्षण में रावत ने न सिर्फ अपनी कुर्सी बचाई बल्कि भाजपा के दांव को उलट दिया था। रावत के पक्ष में 33 विधायकों ने वोट डाले थे। तो विरोध में मतदान करने वाले विधायकों की संख्या 28 थी।
इस संख्या बल के बदौलत राज्यसभा की सीट कांग्रेस के खाते में जानी तय मानी जा रही है। बावजूद उसके भाजपा रणनीतिकार अब महाराज को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाकर हरीश रावत के लिए नई मुसिबत पैदा करने की फिराक में थे। यदि महाराज के समर्थक विधायक उनके नाम पर भाजपा उम्मीदवार को वोट कर दें तो बाजी उलटी हो सकती है। लेकिन महाराज के इंकार ने रावत को फिलहाल एक और नई मुसीबत से बचा लिया है।