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वैश्य-जाट कार्ड से राजस्थान-बिहार के कई नेताओं के भविष्य पर ग्रहण, भाजपा ने यूं ही नहीं लगाया दांव

हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली Updated Mon, 16 Sep 2019 02:36 AM IST
सतीश पूनिया-संजय जायसवाल (फाइल फोटो) - फोटो : Social Media

खास बातें

  • राजस्थान में सतीश पूनिया तो बिहार में डॉ. संजय को जिम्मेदारी
  • दोनों ही राज्यों में अध्यक्ष के नामों से भाजपा ने सबको चौंकाया
  • फैसले ने राजस्थान-बिहार के कई कद्दावर नेताओं की बढ़ाई चुनौती
भाजपा नेतृत्व का अध्यक्ष पद के लिए राजस्थान में जाट तो बिहार में वैश्य कार्ड ने न सिर्फ कई नेताओं की महत्वाकांक्षा में पलीता लगा दिया है। इस फैसले के बाद इन दोनों प्रदेशों के कई कद्दावर नेताओं के भविष्य की राह आसान नहीं रह जाएगी। गौरतलब है कि पार्टी नेतृत्व ने राजस्थान में सबको चौंकाते हुए जाट बिरादरी के सतीश पूनिया पर दांव लगाया तो बिहार में वैश्य बिरादरी के डॉ संजय जायसवाल पर।
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बिहार की बात करें तो इस पद पर दावेदारी के लिए राधामोहन मोहन सिंह, रामकृपाल यादव, राजीव प्रताप रूडी जैसे पूर्व केंद्रीय मंत्रियों की लंबी फेहरिस्त थी। चूंकि चुनाव जीतने के बाद भी इन नेताओं को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली थी, ऐसे में इन्हें खुद को राज्य संगठन की कमान मिलने की उम्मीद थी। 

चूंकि डिप्टी सीएम के पद पर वैश्य बिरादरी के सुशील कुमार मोदी हैं, ऐसे में राजपूत बिरादरी के राधामोहन और रूडी को मौका मिलने की उम्मीद थी। यह भी माना जा रहा था कि यादव बिरादरी के नित्यानंद राय के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद राजद के इसी बिरादरी के वोट बैंक में सेंध लगाने केलिए संगठन की कमान रामकृपाल को दी जा सकती है। 

अब जबकि नेतृत्व ने वैश्य बिरादरी के ही जायसवाल को अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है, तब इन नेताओं के लिए मुश्किलों का दौर शुरू होने वाला है। चूंकि केंद्रीय मंत्रिमंडल में बिहार की पर्याप्त उपस्थिति है, इसलिए निकट भविष्य में होने वाले मंत्रिमंडल विस्तार में भी इनके शामिल होने की संभावना कम है।

बिहार की तर्ज पर भाजपा नेतृत्व ने राजस्थान में पूनिया को अध्यक्ष बना कर सबको चौंकने पर मजबूर किया। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद राज्यवर्धन राठौर को राज्य संगठन की कमान दी जाएगी। हालांकि इस पद की दौरान में राजेंद्र राठौर भी शामिल थे। 

अध्यक्ष मदन लाल सैनी के निधन के बाद माना जा रहा था कि पार्टी दलित या राजपूत बिरादरी में से किसी को संगठन की कमान देगी। सूत्रों का कहना है कि जाट बिरादरी को अध्यक्ष बनाने के पीछे उद्येश्य इस बिरादरी में कद्दावर नेतृत्व को उभारना है। जिसका लाभ हरियाणा, पश्चिम उत्तर के साथ राजस्थान और मध्य प्रदेश के के जाट बहुल इलाकों में लिया जा सके।
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