समस्त विश्व को अध्यात्म, तर्क, विज्ञान और काव्य-सौंदर्य की अनुभूति कराई है। भारतीयों ने संस्कृत को वैज्ञानिक और परिष्कृत रूप दिया है। पाणिनि ने व्याकरण को इस तरह व्यवस्थित किया कि आज भी भाषा के अध्ययन में उनकी प्रणाली का आधार लिया जाता है।
पतंजलि ने योग से मानसिक अनुशासन की ऐसी विधा विकसित की, जो आत्म-नियंत्रण का पाठ पढ़ाती है। भाषा के उच्चारण के लिए मुख के विभिन्न अंगों का विश्लेषण कर वेदों की शाखाओं और प्रातिशाख्यों के ग्रंथ बनाए गए, जो आज भी गणित और विज्ञान की नींव माने जाते हैं।
भारत के विद्वानों ने शून्य का ऐसा गूढ़ ज्ञान विकसित किया, जो अरबों के माध्यम से यूरोप तक पहुंचा और आधुनिक गणित की नींव बना। इस प्रकार, भारतीय ज्ञान का विश्व भर में प्रभाव और ऋण अतुलनीय है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक, पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' से शंकराचार्य के अद्वैत-चिंतन तक, कालिदास की काव्य धारा से लेकर चरक और सुश्रुत के चिकित्सा-विज्ञान तक संस्कृत ने जीवन के हर पक्ष को शब्द और दृष्टि प्रदान की है।
योग, ज्योतिष, आयुर्वेद और संगीत संस्कृत में ही प्रकट हुए हैं। इसी से संस्कृत साहित्य की अद्वितीय परंपरा भारत की सीमाओं को लांघकर तिब्बत, चीन, जावा, इंडोनेशिया, अरब और यूरोप जैसे अनेक देशों तक पहुंची है।
संस्कृत ने दशमलव पद्धति से लेकर तुलनात्मक भाषाशास्त्र के साथ आधुनिक विज्ञान और मानविकी विषयों की नींव रखी। संस्कृत में लिखी रामायण, महाभारत और भागवत महापुराण की कथाएं एवं वेदांत पद्धति ने असंख्य मुस्लिम विद्वानों और ईसाई चिंतकों को भी प्रभावित किया है।
संस्कृत मात्र भाषा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और चिरंतन मूल्यों की वाहिका है। इसने सहस्रों वर्षों में ऐसा तलस्पर्शी एवं विशाल साहित्य रचा है, जिसका कोई समतुल्य नहीं है। जीवन का कोई भी अंश ऐसा नहीं है, जिस पर संस्कृत में कुछ लिखा न गया हो।
विंटरनित्ज ने 1923 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में दिए 'भारतीय साहित्य की कुछ समस्याएं' विषयक व्याख्यान में पश्चिम पर पड़े संस्कृत साहित्य के प्रभाव का मार्मिक उल्लेख किया था। मैक्समूलर, मोनियर विलियम्स, वेबर और विलियम जोंस जैसे विदेशी विद्वानों ने इसकी महत्ता को अंतरराष्ट्रीय पटल पर प्रतिष्ठित किया। एचएच गोवेन ने 1931 में ठीक ही कहा था कि भारतीय साहित्य का एक यथार्थ सत्य मूल्य है, जिसे काल की दूरी नष्ट नहीं कर सकती।
पवित्रता, विविधता और अजस्त्रता में विश्व का कोई भी साहित्य इसकी तुलना में खड़ा नहीं हो सकता। संस्कृत दिवस केवल अतीत के गौरव का स्मरण नहीं है, यह वर्तमान और भविष्य के लिए भी दिशा-संकेत है।
यदि हम आत्मचिंतन, आत्मसंयम और आत्मोन्नति की ओर बढ़ना चाहते हैं, तो हमें शास्त्र, काव्य, नीति और दर्शन की ओर पुनः लौटना होगा। संस्कृत दिवस भारत की आत्मा का उत्सव है। यह उस अमर वाणी का स्मरण पर्व है, जिसने बताया कि भाषा केवल संवाद नहीं, मोक्ष का द्वार भी है।