अजहरी मियां ने खुद को हमेशा मजहबी मामलों तक ही सीमित रखा। सियासत और दुनियावी चमक-दमक का माहौल उन्हें कभी भी मजहबी और तालीम के दायरे से बाहर नहीं खींच पाया। न जाने कितनी राजनीतिक हस्तियां उनकी चौखट तक आईं लेकिन वह कभी उनसे प्रभावित नहीं हुए, न उन्हें बहुत ज्यादा तवज्जो दी। हालांकि मजहबी मामलों में उन्हें कभी कुछ गलत होता लगा तो उन्होंने पूरी शिद्दत से इसके खिलाफ आवाज बुलंद की। इंदिरा गांधी की हुकूमत में नसबंदी के आदेश का भी आपात काल लागू होते हुए भी उन्होंने सख्त विरोध किया था।
जांनशीने हिंद मुफ्ती आजम हिंद मौलाना अख्तर रजा खां की सियासी मामलात में दिलचस्पी बिल्कुल भी नहीं थी। यह उन्हीं की मजबूती थी कि आला हजरत के उर्स के दौरान भी सियासी तकरीरों पर पूरी तरह रोक रहती है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी का आला हजरत खानदान से गहरे रिश्ते थे। अपने शासन में उन्होंने ही मौलाना रेहान रजा खां को एमएलसी नामित कराया था। रेहान रजा खां का कार्यकाल पूरा हुआ तो एनडी तिवारी ने अजहरी मियां के आगे उन्हें एमएलसी बनाने की पेशकश रखी लेकिन अजहरी मियां ने उसे कबूल करने से इंकार करने में जरा भी वक्त नहीं लगाया।
सन् 1989 में तत्कालीन गर्वनर उस्मान आरिफ ने भी उन्हें एमएलसी नामित करने को कहा लेकिन तब भी उन्होंने इंकार कर दिया। कई साल पहले बरेली आए राहुल गांधी ने भी शहर में अपनी पदयात्रा के दौरान अजहरी मियां से मिलने की कोशिश की लेकिन अजहरी मियां ने उनसे मिलने में जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसी तरह तत्कालीन वरिष्ठ सपा नेता अमर सिंह के साथ आए फिल्म स्टार संजय दत्त को भी मायूसी हाथ लगी।
अजहरी मियां से मिलने की काफी कोशिश के बावजूद उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा। सियासत से प्रभावित होने के उलट अजहरी मियां सियासतदानों के मजहबी मामलात में दखल देने का हमेशा सख्त विरोध करते रहे। सन् 1975 में इमरजेंसी के दौरान उन्होंने इंदिरा गांधी के नसबंदी लागू करने के खिलाफ फतवा दिया और काफी दबाव पड़ने के बावजूद उसे वापस नहीं लिया।