समलैंगिकता और दुनिया
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समलैंगिक शादी का मुद्दा देश में एक बार फिर चर्चा में है। दरअसल, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर समलैंगिक जोड़ों की शादी का विरोध किया है। सरकार ने हलफनामे में कहा कि समान लिंग वाले लोगों का साथी के रूप में साथ रहना अपराध नहीं है लेकिन इसे पति-पत्नी और बच्चों की भारतीय परिवार की इकाई के समान नहीं माना जा सकता। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब मोदी सरकार समलैंगिक शादी का विरोध किया हो, इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट में भी इसके खिलाफ खड़ी हुई थी।
अभी यह मामला क्यों चर्चा में आया? समलैंगिक शादी के खिलाफ सरकार के क्या तर्क हैं? समलैंगिक शादी पर अन्य देशों में क्या स्थिति है? किन देशों में इसे मान्यता मिली हुई है? किन देशों में ऐसा करने पर सजा का प्रावधान है? क्या भारत में समलैंगिक विवाह को मंजूरी मिल सकती है? आइये जानते हैं…
समलैंगिक
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अभी यह मामला क्यों चर्चा में आया?
एक समलैंगिक जोड़े ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर समलैंगिक शादी को मान्यता देने की मांग की है। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। जिस पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया। इस हलफनामे में सरकार ने समलैंगिक जोड़ों की शादी का विरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल जनवरी में विभिन्न उच्च न्यायालयों से समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दिलाने वाली विभिन्न याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित कर लिया था। यह मामला मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया था। पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस भेजते हुए 15 फरवरी तक जवाब भी मांगा था।
Supreme Court
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विरोध में सरकार ने क्या तर्क दिए?
सरकार ने समलैंगिक विवाह के विरोध में सुप्रीम कोर्ट के सामने कई तर्क रखे। केंद्र ने कहा कि समलैंगिकों का जोड़े के रूप में साथ रहने और शारीरिक संबंध बनाने की, भारत की पारिवारिक इकाई की अवधारणा से तुलना नहीं हो सकती। भारतीय पारिवारिक इकाई की अवधारणा में एक पुरुष और महिला शादी करते हैं, जिसमें पुरुष 'पति' और महिला 'पत्नी' होती है। दोनों विवाह के बाद बच्चे पैदा करते हैं और पुरुष 'पिता' और महिला 'माता' बनती है।
सरकार ने आगे कहा कि शादी को हमारे समाज में संस्था का दर्जा प्राप्त है, जिसका अपना सार्वजनिक महत्व होता है। शादी संस्था के कई अधिकार और दायित्व भी होते हैं। सरकार ने कहा कि विशेष सामाजिक संबंध के लिए मान्यता लेना कोई मौलिक अधिकार नहीं है।
केंद्र सरकार ने कहा कि समान लिंग वाले लोगों की शादी को मान्यता देने से मौजूदा पर्सनल लॉ का उल्लंघन होगा, जिनमें निषिद्ध संबंधों की डिग्री, शादी की शर्तें और अनुष्ठान की आवश्यकताएं आदि शामिल हैं। साथ ही घरेलू हिंसा कानून समेत कई कानूनी प्रावधान समलैंगिक शादी में लागू करना संभव नहीं है।
Delhi high court
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पहले भी समलैंगिक शादी के विरोध में रही है केंद्र सरकार
इसी तरह के एक मामले में 2021 में दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष दायर एक हलफनामे में, केंद्र सरकार ने समलैंगिक शादी को मान्यता देने का कड़ा विरोध किया था। केंद्र ने कहा था भारत में विवाह को केवल तभी मान्यता दी जा सकती है, जब वह जैविक पुरुष और जैविक महिला के बीच हो जो संतान पैदा करने में सक्षम हों।
कितने देशों में समलैंगिक विवाह को मंजूरी मिल चुकी है?
दुनिया में अभी 33 ऐसे देश हैं, जहां समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी मिली हुई है। हालांकि, ज्यादातर देशों में अदालत के फैसले के बाद ही समलैंगिकों को ये अधिकार मिला। समलैंगिक विवाह को मंजूरी देने वाला सबसे पहला देश नीदरलैंड बना। इसके अलावा ऑस्ट्रिया, ताइवान, कोलंबिया, अमेरिका, ब्राजील, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, क्यूबा, डेनमार्क, स्वीडन, दक्षिण अफ्रीका, माल्टा, फिनलैंड, ब्रिटेन जैसे देशों में भी समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी मिली हुई है।
फाइल फोटो
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कितने देशों में समलैंगिकता अवैध है?
एक रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम पांच अन्य देशों - पाकिस्तान, अफगानिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और मॉरिटानिया में शरिया अदालतों के तहत समलैंगिक संबंधों पर मौत की सजा तक दी जा सकती है। ईरान, सोमालिया और उत्तरी नाइजीरिया के कुछ हिस्सों में भी यही बात लागू होती है। वहीं 71 देशों में समान-लिंग संबंध अप्राकृतिक संबंध कानूनों के तहत विभिन्न प्रकार के अपराध की श्रेणी में आते हैं। इन सभी में देशों में समलैंगिक संबंधों पर जेल की सजा हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट
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क्या भारत में समलैंगिक विवाह को मंजूरी मिल सकती है?
इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता चंद्र प्रकाश पांडेय ने बताया, 'छह सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने समलैंगिकता को अपराध मानने वाले 158 साल पुराने कानून को रद्द कर दिया था। मौजूदा चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ उस समय कानून रद्द करने वाली बेंच में शामिल थे। इस कानून के रद्द होने के बाद समलैंगिकों के हितों की चर्चा काफी तेजी से होने लगी थी। समलैंगिक विवाह के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट का ये ऐतिहासिक फैसला एक बड़ा आधार हो सकता है।'
पांडेय के अनुसार, 'भारत में अधिकतर लोग अपने धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार ही शादियां करते हैं। अलग-अलग धर्म के मैरिज एक्ट भी हैं। मसलन हिंदू मैरिज एक्ट के तहत हिंदू, बौद्ध, सिख, लिंगायत और जैन धर्म के जोड़े आपस में शादी कर सकते हैं। मुस्लिम मैरिज एक्ट में मुसलमानों के निकाह का प्रावधान है। इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट के तहत ईसाई जोड़े शादी कर सकते हैं। स्पेशल मैरिज एक्ट में अलग-अलग धर्म के लड़के और लड़कियां शादी कर सकते हैं। इसके अलावा फॉरेन मैरिज एक्ट के तहत विदेश में रहने वाले भारतीय शादी करते हैं।'
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने भारत में समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता देने वाली याचिकाओं को पांच जजों की संविधान पीठ को विचार के लिए भेज दिया है। कोर्ट ने इसको मौलिक मुद्दा कहा है। पांच जजों की बेंच अब 18 अप्रैल को मामले की सुनवाई करेगी। बता दें, कोर्ट सोमवार को समलैंगिक शादियों विवाहों के लिए कानूनी मान्यता की मांग करने वाली याचिकाओं की सुनवाई कर रहा था।