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SC: समलैंगिक शादियों पर सुनवाई के दौरान CJI की अहम टिप्पणी, बोले- लाइव स्ट्रीमिंग से कोर्ट घर-घर पहुंचा

Tue, 09 May 2023 10:24 PM IST
कुमार विवेक न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Supreme Court News and Updates: प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग वास्तव में हमारी अदालत को पूरी तरह से घरों और आम नागरिकों के दिलों तक ले गई है और मुझे लगता है कि यह प्रक्रिया का हिस्सा है।" बेंच में चीफ जस्टिस के अलावे जस्टिस एसके कौल, एसआर भट्ट, हिमा कोहली और पीएस नरसिम्हा शामिल थे।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि उसकी कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग अदालत को आम नागरिकों के घरों और दिलों तक ले गई है और वह यह सुनिश्चित करने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने की कोशिश कर रहा है कि लाइव-स्ट्रीम की गई सामग्री अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाओं में एक साथ उपलब्ध कराई जाए ताकि अधिक से अधिक लोग इसका अनुसरण कर सकें। प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग करने वाली याचिकाओं पर आठवें दिन दलीलें सुनने के दौरान यह टिप्पणी की। मध्य प्रदेश की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि कार्यवाही का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि समाज में मंथन हो रहा है। देश के विभिन्न कोनों में इस बहस और लाइव स्ट्रीमिंग के कारण लोग इन मुद्दों के बारे में सोच रहे हैं।

सीजेआई बोले- तकनीक की मदद से क्षेत्रीय भाषाओं में भी स्ट्रीमिंग की चल रही तैयारी

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग वास्तव में हमारी अदालत को पूरी तरह से घरों और आम नागरिकों के दिलों तक ले गई है और मुझे लगता है कि यह प्रक्रिया का हिस्सा है।" बेंच में चीफ जस्टिस के अलावे जस्टिस एसके कौल, एसआर भट्ट, हिमा कोहली और पीएस नरसिम्हा शामिल थे। द्विवेदी ने कहा कि इस मामले में एकमात्र बाधा यह है कि अदालत में बहस अंग्रेजी में होती है और यह एक ऐसी भाषा जिसे गांवों में रहने वाले अधिकांश लोग नहीं समझते हैं। इसपर सीजेआई ने कहा, 'आपको आश्चर्य होगा द्विवेदी जी कि हम उस पर भी काम कर रहे हैं। यह विषय सुप्रीम कोर्ट के प्रशासन के संज्ञान के बाहर नहीं है।

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न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, "हम इस पर काम कर रहे हैं, आपके पास जो प्रतिलिपि हैं उस पर हम अब यह सुनिश्चित करने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने की कोशिश कर रहे हैं कि लाइव स्ट्रीमिंग सामग्री को एक साथ उन भाषाओं में उपलब्ध कराया जा सके, जिन्हें सभी नागरिक समझ सकें।" इस मामले में 'जमीयत-उलेमा-ए-हिंद' का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि प्रौद्योगिकी अब एक व्यक्ति को अंग्रेजी में क्या बोला जा रहा है उसे जापानी सहित विभिन्न भाषाओं में सुनने की सुविधा देती है।

लिव इन, समलैंगिक जोड़ों को सरोगेसी कानून के तहत सेवाएं नहीं दे सकते: केंद्र

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में केंद्र सरकार ने बताया कि लिव-इन पार्टनर और समलैंगिक जोड़ों को सरोगेसी कानून के तहत सेवाओं का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। केंद्र ने सरोगेसी अधिनियम, 2021 और सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2021 की शक्तियों को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर अतिरिक्त हलफनामा दाखिल किया।

केंद्र ने हलफनामे में कहा कि राष्ट्रीय बोर्ड के विशेषज्ञ सदस्यों ने 19 जनवरी को अपनी बैठक में राय दी थी कि अधिनियम (एस) के तहत परिभाषित युगल की परिभाषा सही है और उक्त अधिनियम के तहत समलैंगिक जोड़ों को सेवाओं का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि एकल माता-पिता को तीसरे पक्ष से अंडाणु और शुक्राणु के लिए एक दाता की आवश्यकता होती है जो बाद में कानूनी जटिलताओं और हिरासत के मुद्दों को जन्म दे सकती है। इसके अलावा, लिव-इन पार्टनर कानून से बंधे नहीं हैं और सरोगेसी के जरिये पैदा हुए बच्चे की सुरक्षा सवालों के घेरे में आ जाएगी। 

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केंद्र ने कहा कि संसदीय समिति ने अपनी 129वीं रिपोर्ट में सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (एआरटी) अधिनियम, 2021 के दायरे में लिव-इन जोड़ों और समलैंगिक जोड़ों को शामिल करने के मुद्दे पर विचार किया था। उन्होंने पाया कि भले ही लिव-इन और समलैंगिक जोड़ो के रिश्ते को अदालत ने अपराध की श्रेणी से हटा दिया है। उन्हें वैध नहीं करार किया गया है। समलैंगिक/लिव-इन जोड़ों के संबंध में न तो कोई विशेष प्रावधान पेश किए गए हैं और न ही उन्हें कोई अतिरिक्त अधिकार दिया गया है। 

केंद्र ने यह भी बताया कि संसदीय समिति ने अपनी 102वीं रिपोर्ट में सरोगेसी कानून के दायरे में लिव-इन व समलैंगिक जोड़ों को शामिल करने के मुद्दे पर भी विचार किया। उनका मानना था कि इन धाराओं को शामिल करना समाज में ऐसी सुविधाओं के दुरुपयोग की गुंजाइश खोलेगा और सरोगेसी के माध्यम से पैदा हुए बच्चे का बेहतर भविष्य सुनिश्चित करना मुश्किल होगा।

याचिकाओं में से एक अरुण मुथुवेल ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड मोहिनी प्रिया के माध्यम से दायर की थी। इनमें से एक याचिका 200 डॉक्टरों ने दायर की है। उन्होंने एआरटी अधिनियम, 2021 के कई प्रतिबंधात्मक और अवैज्ञानिक प्रावधानों को चुनौती दी थी। साथ ही अन्य अवैज्ञानिक प्रतिबंधों के साथ आईवीएफ में अंडाणु दाताओं को मौद्रिक मुआवजे के प्रावधान की कमी के बारे में चिंता जताई थी। इनका दावा था कि एक अंडाणु दाता कितनी संख्या में दान कर सकता है जो न केवल अवैज्ञानिक है बल्कि अंडाणु दाताओं के दान करने के अधिकार का उल्लंघन है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसकी प्रजनन स्वायत्तता का हिस्सा है।

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