समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट को केंद्र ने कहा कि सगे-संबंधियों से यौनाचार निषेध को चुनौती देने के लिए यौन अभिरुचि की स्वतंत्रता और स्वायत्तता के बारे में भविष्य की दलीलें दी जा सकती हैं। केंद्र की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि अनाचार दुनिया में असामान्य नहीं है, लेकिन हर जगह प्रतिबंधित है।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि एक व्यक्ति के रूप में यौन अभिरुचि या स्वायत्तता का उपयोग विवाह के सभी पहलुओं में कभी नहीं किया जा सकता है, जिसके आधार पर विवाह को रद्द किया जा सकता है। इन पहलुओं में विवाह करना और निषिद्ध संबंधों में प्रवेश शामिल है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह सभी कानून के नियमों के अधीन हैं।
इसपर मेहता ने पीठ से कहा, मैं जिम्मेदारी की भावना के साथ कह रहा हूं, भले इसे स्वीकार किया जाए या नहीं, यह अलग बात है, लेकिन अनाचार निषेध को भी चुनौती देने के लिए दलीलें दी जा सकती हैं। उन्होंने विशेष विवाह अधिनियम, 1954 की धारा 2(बी) का उल्लेख किया जो निषिद्ध संबंधों की सीमा के बारे में बात करती है। मेहता ने कहा कि एक कानून को किसी वर्ग के लिए 'ए' और कुछ वर्ग के लिए 'बी' के अर्थ में नहीं पढ़ा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देना संसद के अधिकारक्षेत्र में आता है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने केंद्र से पूछा कि समलैंगिक जोड़ों को सामाजिक लाभ कैसे दे सकते हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से समलैंगिक जोड़ों की वैवाहिक स्थिति को कानूनी मान्यता दिए बिना संयुक्त बैंक खाते या बीमा पॉलिसियों में भागीदार को नामित करने जैसे बुनियादी सामाजिक लाभ देने के तरीके खोजने को कहा।
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने मौखिक टिप्पणी की, आपने एक बहुत शक्तिशाली तर्क दिया है कि यह काम संसद का है। निश्चित यह विधायिका का क्षेत्र है, लेकिन क्या सरकार सह-संबंधों के साथ कुछ करना चाहती है। पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि अगर समलैंगिक जोड़ों को कानूनी मान्यता देने की दलील स्वीकार की जाती है तो कल को कोई रिश्तों में यौन संबंध के मामले में अदालत में यह कहते हुए आ सकता है कि यदि दो वयस्कों ने निषिद्ध यौन संबंध बनाने का फैसला किया है तो राज्य को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।
पीठ ने कहा, जब अदालत ‘मान्यता’ की बात कहती है तो इसे विवाह के रूप में मान्यता देना, समझने की आवश्यकता नहीं है। इसका मतलब ऐसी मान्यता हो सकती है जिससे जोड़ों को कुछ लाभों का अधिकार मिले। दो लोगों के जुड़ाव को शादी से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है। पीठ ने मेहता से कहा, एक बार जब आप कहते हैं कि सहवास का अधिकार एक मौलिक अधिकार है तो यह राज्य का दायित्व है कि सहवास के सभी सामाजिक प्रभाव को कानूनी मान्यता दी जाए। अदालत शादी में बिल्कुल नहीं जा रही है। पीठ ने यह भी जानना चाहा कि सुरक्षा और सामाजिक कल्याण की भावना कैसे पैदा की जा सकती है। यह कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है कि ऐसे संबंध समाज में बहिष्कृत न हों। इस मामले में अगली सुनवाई अब तीन मई को होगी।