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Samajwadi Party: सपा बदलने लगी मुलायम की बनाईं 'सियासी चालें,' पार्टी पर हावी हो रहे हैं स्वामी प्रसाद मौर्य!

सार

Samajwadi Party: सियासी जानकारों का मानना है कि 'एम' 'वाई' समीकरणों के साथ जिस तरह से ब्राह्मण और ठाकुरों को साध कर मुलायम सिंह यादव ने पूर्ण बहुमत की सत्ता पाई वह फिलहाल स्वामी प्रसाद मौर्य के तैयार किए गए नए सियासी समीकरणों के साथ अलग दिशा में जा रही है...
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Samajwadi Party: स्वामी प्रसाद मौर्य अखिलेश यादव - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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मुलायम सिंह यादव के रहते समाजवादी पार्टी ने जातिगत समीकरणों को साधते हुए जो सत्ता की राह तैयार की थी, क्या वह अब बदलने लगी है। सियासी जानकारों का मानना है कि 'एम' 'वाई' समीकरणों के साथ जिस तरह से ब्राह्मण और ठाकुरों को साध कर मुलायम सिंह यादव ने पूर्ण बहुमत की सत्ता पाई वह फिलहाल स्वामी प्रसाद मौर्य के तैयार किए गए नए सियासी समीकरणों के साथ अलग दिशा में जा रही है। वहीं समाजवादी पार्टी के भीतर भी नए सियासी समीकरणों को लेकर नेताओं के बीच में चर्चाएं हो रही हैं।

सभी सपा में था ठाकुरों का बोलबाला

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि समाजवादी पार्टी की सियासी चाल ने इस बार अपनी राह बदल दी। राजनीतिक विश्लेषक अनिरुद्ध कहते हैं कि कभी मुलायम सिंह यादव के दौर में मुस्लिम यादव और ठाकुर का जो गठजोड़ ब्राह्मणों के साथ मिलकर बना था, वह न सिर्फ मजबूत था, बल्कि सियासत में भी सत्ता की मजबूत दावेदारी करता था। पार्टी में जनेश्वर मिश्र से लेकर ब्रह्मा शंकर त्रिपाठी जैसे बड़े चेहरे भी थे। अनिरुद्ध कहते हैं 2012 में जब समाजवादी पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई, तो उस वक्त सबसे ज्यादा जीते हुए ठाकुर प्रत्याशी समाजवादी पार्टी से ही थे। पार्टी में जातिगत समीकरणों का ताना-बाना कुछ इस तरह बुना था कि जनेश्वर मिश्र की नीतियों वाली इस पार्टी में माता प्रसाद पांडे विधानसभा अध्यक्ष का पद देकर जातीय समीकरणों को बखूबी साधा था।

उत्तर प्रदेश की सियासत को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक बृजेश शुक्ला कहते हैं कि समाजवादी पार्टी में इस वक्त जिस तरीके से स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपनी एंट्री दर्ज कराई और अपने विवादित बयानों से पार्टी के आलाकमान को भी अपने पक्ष में कर लिया उससे तो यही लग रहा है कि पार्टी ने नई राह पकड़ ली है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी शुरुआत से ही मुस्लिम और यादव के जातिगत समीकरणों को साधने हुए उत्तर प्रदेश में सियासत से सत्ता के शीर्ष पर पहुंची थी। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि 2017 के बाद हुए विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में जिस तरीके से समाजवादी पार्टी का ग्राफ सियासी पिच पर लड़खड़ाया, उससे पार्टी को नए तरीके से सियासी गठबंधन और सत्ता तक पहुंचने के सभी पैमानों को एक बार फिर से खंगालने की जरूरत महसूस हुई।

2019 में बसपा से हुआ था गठबंधन

राजनीतिक विश्लेषक जटाशंकर सिंह कहते हैं कि इसी वजह से समाजवादी पार्टी ने 2019 में बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया। वह कहते हैं कि मंशा यही थी कि एमवाई समीकरण के साथ जब दलित वोटों का जुटान समाजवादी पार्टी के साथ होगा, तो पार्टी का ग्राफ बहुत तेजी से आगे बढ़ेगा। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। हालांकि इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को जरूर बहुत फायदा हुआ। 2014 के लोकसभा चुनावों में शून्य पर पहुंची बसपा 10 लोकसभा सीटों के साथ एक बार बड़ी वापसी कर सियासत के मैदान में खड़ी थी। सियासी जानकारों का मानना है कि कांग्रेस और बसपा के साथ तालमेल के बाद भी समाजवादी पार्टी का जब सियासी ग्राफ नहीं बढ़ा, तो स्वामी प्रसाद मौर्य रामचरित मानस की चौपाइयों पर और पवित्र ग्रंथ पर विवादित बयान देकर पार्टी को एक नई राह दे दी।

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक बृजेश शुक्ला कहते हैं कि आप समाजवादी पार्टी ने बसपा के वोट बैंक दलितों पर रामचरितमानस की विवादित चौपाई के माध्यम से डोरे डालने शुरू किए हैं। शुक्ला कहते हैं कि जबकि हकीकत यह है कि जिस वोट बैंक पर रामचरितमानस की विवादित चौपाई के साथ समाजवादी पार्टी उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है, दरअसल वह तो पिछले कुछ चुनावों से बसपा का साथ छोड़कर भारतीय जनता पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे में समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती न सिर्फ बसपा से दलित वोट को खींचना है, बल्कि भाजपा से जुड़े दलितों को भी खींचना शामिल है। इसके साथ सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भी स्वामी प्रसाद मौर्य के विवादित बयान को मुख सहमति देते हुए जातिगत जनगणना का भी कार्ड खेल दिया है।

निशाने पर ब्राह्मण

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मुलायम सिंह यादव के समय में यादव और मुस्लिम के गठजोड़ को मिलाकर समाजवादी पार्टी ब्राह्मण और ठाकुरों के माध्यम से न सिर्फ जीत का सिलसिला आगे बढ़ा रही थी, बल्कि प्रदेश में सत्ता के शीर्ष पर भी पहुंची थी। लेकिन अब जो सियासी गणित दिख रहा है उसके मुताबिक स्वामी प्रसाद मौर्य के विवादित बयानों के बाद बन रहे समीकरणों में समाजवादी पार्टी के निशाने पर ब्राह्मण हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी की गठित की गई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जिस तरीके से अपने पुराने वोट बैंक को ब्राह्मण और ठाकुरों को पुरानी कार्यसमिति के मुताबिक जगह नहीं मिली है, वह भी पार्टी के लिए एक चुनौती बन सकता है।

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