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Year Ender 2020: सलाम उन कोरोना योद्धाओं को, जो जान हथेली पर रख बखूबी निभा रहे फर्ज

Thu, 24 Dec 2020 07:11 AM IST
दीप्ति मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोरोना योद्धा - फोटो : Amar Ujala
दुनिया भर में बीते करीब एक साल से वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण का खौफ है। इस महामारी ने लोगों की जिंदगियां उजाड़ दी हैं। लोग घरों में कैद होकर रह गए। कोरोना ने करोड़ों लोगों को अपना शिकार बनाया, तो लाखों लोगों की जिंदगियां लील लीं। वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लागू लॉकडाउन में हजारों की संख्या में उद्योग एवं कंपनियों के दरवाजे पर ताले पड़ गए, लाखों बेरोजगार हो गए। यहां तक कि लाखों लोगों को दो वक्त की रोटी के लाले पड़ गए। 

बहरहाल, इसके इतर इस भयावह दौर में भी कुछ अच्छी चीजें भी सामने आई हैं। संकट की इस घड़ी में मानवता और इंसानियत की मिसाल भी देखने को मिली। लोगों को एक-दूसरे की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाते देखा गया। बेहद डरावने पलों में वो योद्धा सामने आए, जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर दूसरों की जान बचाई। दवा समेत तमाम जरूरी सामान और सुविधाएं लोगों तक पहुंचाईं। जिन्होंने अपनी, अपने परिवार और घर की चिंता किए बिना लोगों को सुरक्षित रखने का हरसंभव प्रयास किया। इस बीच कइयों ने तो अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए इस युद्ध में जान तक न्योछावर कर दी। आइए सलाम करते हैं ऐसे ही कोरोना योद्धाओं को, जिन्होंने इस संकट की घड़ी में अपना फर्ज बखूबी निभाया...
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
सफाईकर्मी/सैनिटाइजेशन कर्मचारी 
वायरस के प्रसार को रोकने के लिए इन नायकों ने सार्वजनिक स्थलों समेत हमारे आसपास परिवेश को स्वच्छ और सुरक्षित बनाया। सफाईकर्मियों ने लॉकडाउन के दौरान जब सभी लोग अपने घरों में सुरक्षित थे, उस वक्त इन्होंने खुद को जोखिम में डालकर घरों का कचरा उठाने से लेकर गलियां, नालियां, सड़क और अस्पताल तक हर जगह स्वच्छता मुहैया कराई। 
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स्वास्थ्य कर्मी। - फोटो : PTI
चिकित्साकर्मी 
कोरोना के खिलाफ लड़ाई में देश के डॉक्टर और नर्स समेत तमाम स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान पर खेलकर कोरोना को मात देने में जुटे हुए हैं। कोरोना संकट के दौरान ये फ्रंट लाइन वाॅरियर्स डबल शिफ्ट कर रहे हैं। लंबे समय तक अपने परिवार से दूर रहकर कोरोना मरीजों की तीमारदारी में जुटे रहते हैं। कर्तव्य निभाकर घर पहुंचते हैं, तो बच्चों, मां और अन्य परिजनों को इस संक्रमण से बचाने की जद्दोजहद करनी होती है। अपनों को बिना छूए, बिना गले लगाए बस दूर से देखकर ही संतोष करना पड़ता है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
आशा कार्यकर्ता 
जब अधिकांश लोग अपने घरों में सुरक्षित रह रहे हैं, उस वक्त आशा वर्कर्स कोरोना के खिलाफ लड़ाई में जुटी हैं। आशा वर्कर्स कोरोना काल में आवश्यक दवाएं समुदाय तक पहुंचाने, पोषण वितरण सुनिश्चित करने के अथक प्रयासों में लगी हुई हैं। महामारी के दौरान आशा वर्कर्स घर-घर जाकर कोरोना के लक्षण वाले मरीजों की पहचान करने, मास्क, सैनिटरी पैड, दवाएं व अन्य जरूरी सामान वितरित करने और कोरोना बचाव संबंधी नियमों को लेकर लोगों को जागरूक करने और जरूरी सर्वे करने के काम में लगी रहीं हैं। इस बीच कई आशा वर्कर्स ने पीपीई किट समेत अन्य सुरक्षा उपकरणों के बिना ही काम कर रहीं हैं। आशा वर्कर्स ज्यादातर गरीब परिवारों से आती हैं। ये देश में स्वास्थ्य सेवा प्रणाी की रीढ़ मानी जाती हैं। 
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डॉ. रामचंद्र दानेकर - फोटो : ANI
डॉ. रामचंद्र दानेकर 
कोरोना काल में स्वास्थ्य मंत्रालय ने 60 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोगों को घर में रहने के निर्देश हैं। इसके बावजूद महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में एक 87 वर्षीय होम्योपैथिक डॉक्टर गांव में लोगों का इलाज करने के लिए पहुंचते हैं। वह गरीब लोगों को मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराने के लिए रोजाना तकरीबन 10-15 किलोमीटर साइकिल चला कर गांवों में पहुंचते हैं। इसके बाद घर-घर पहुंचकर उनकी स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का समाधान करते हैं। बता दें कि उम्र भले ही 87 वर्ष की हो चुकी है लेकिन इरादा आज भी जवां  है। कोशिश है हर शख्स को बचा लेने की। रोगों से लोगों को निजात दिलाने की। इसी कोशिश में बुजुर्ग डॉक्टर पिछले 60 वर्षों से मरीजों के घर अपनी साइकल से जाते हैं। उनके इस सेवाभाव की हर तरफ चर्चा है।

 
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वायरोलॉजिस्ट मीनल दखावे भोसले ने रिकॉर्ड टाइम में इस किट को बनाया है - फोटो : BBC
आपदा में अवसर तलाशने वाली मीनल दक्ष 
पुणे स्थित मायलैब डिस्कवरी सॉल्यूशंस में अनुसंधान और विकास प्रमुख के पद पर कार्यरत मीनल दक्ष भोसले ने देश का पहला कोरोना किट बनाया, जिससे परीक्षण की लागत बहुत कम हो गई। उनकी बनाई किट दो से ढाई घंटे में परीक्षण परिणम बता देती है। जबकि इससे पहले 4 से 5 घंटे का समय लगता था। मीनल की बनाई किट की कीमत 1200 रुपये है जबकि इससे पहले बाजार में मौजूद विदेश किट की कीमत 4500 रुपये तक है। मीनल की बनाई प्रत्येक किट से 100 सैंपलों की जांच हो सकती है।
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सुब्रत पति - फोटो : Social Media
पति ने बच्चों को पढ़ाने के लिए पेड़ पर डाला डेरा
कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने लिए लागू लॉकडाउन में स्कूल-कॉलेज बंद हो गए। इस दौरान विद्यार्थियों के लिए ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की गईं। इसमें सबसे बड़ी समस्या मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट बनकर उभरी। पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले निवासी 35 वर्षीय सुब्रत पति को भी इसी समस्या का सामना करना पड़ा। सुब्रत ने समस्या के सामने घुटने टेकने की बजाय नेटवर्क की तलाश की। एक नीम के पेड़ पर चढ़कर देखा, तो नेटवर्क मिले। इसके बाद उन्होंने पेड़ पर अपने दोस्तों की मदद से बांस की खपच्चियों और पुआल को रस्सी से बांधकर एक बैठने के लिए जगह तैयार की। तब से लेकर अब तक सुब्रत रोजाना पेड़ पर चढ़कर विद्यार्थियों की ऑनलाइन पढ़ा रहे हैं। उन्हें घंटों वहां बैठकर क्लास लेनी होती है। इसलिए सुब्रत खाना-पानी भी अपने साथ पेड़ पर ही ले जाते हैं।

 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
पुलिसकर्मी 
लॉकडाउन में जब लोग अपने घरों में सुरक्षित थे, उस वक्त पुलिसकर्मियों ने हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 24-24 घंटे काम किया। महामारी में पुलिस के मानवीय पक्ष की कई कहानियां पढ़ने और सुनने को मिलीं। कोरोना काल में पुलिसकर्मी हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ बुजुर्गों के लिए जरूरी सामान की आपूर्ति, प्रवासियों के लिए भोजन, बेघरों के लिए कपड़े, स्वच्छता को लेकर जागरूक करना और बच्चों और बुजुर्गों के जन्मदिन पर केक लेकर पहुंचने जैसे कई प्रयासों से देशवासियों की सेवा में लगे रहे। 
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Sonu Sood - फोटो : Social Media
अभिनेता सोनू सूद 
फिल्मी पर्दे पर खलनायक का किरदार निभाने वाले बॉलीवुड अभिनेता सोनू सूद कोरोना संकट में प्रवासी मजदूरों और छात्रों के लिए मसीहा बन गए। सोनू सूद परेशान, गरीब और बेसहारा लोगों की मदद के लिए हर समय तैयार रहते हैं। उन्होंने कोरोना महामारी के बीच लोगों की मदद करने की जिम्मेदारी उठाई है। लॉकडाउन में अभिनेता ने अपने दम पर हजारों प्रवासी मजदूरों, छात्रों और जरूरतमंदों को बस, ट्रेन और फ्लाइट से उनके घर पहुंचाने में मदद की थी। इतना ही नहीं मुंबई में फंसे प्रवासी मजदूर और गरीबों तक खाना पहुंचाया। अब तक हजारों जरूरतमंद लोगों की मदद कर चुके हैं। अब भी लोग उनसे सोशल मीडिया पर रोजाना मदद की गुहार लगाते रहते हैं और सोनू सूद हरसंभव मदद पहुंचाने का प्रयास करते हैं। 
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