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ED: 'सहारा समूह ने गोपनीय नकद लेन‑देन के जरिये बेची संपत्तियां', प्रवर्तन निदेशालय का आरोप

Mon, 15 Sep 2025 10:35 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

ED: प्रवर्तन निदेशालय ने आरोप लगाया है कि सहारा समूह ने जनता के जमा पैसों से खरीदी गई संपत्तियों को गुप्त नकद सौदों में बेच दिया। इस मामले में सहारा समूह के दो करीबी सहयोगियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया है। ईडी का दावा है कि सहारा ने पोंजी योजना के जरिए फंड एकत्र कर निवेशकों से धोखा किया और दस्तावेजों में हेराफेरी की ताकि असली भुगतान न करने की सच्चाई छिपाई जा सके।
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ईडी - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सोमवार को आरोप लगाया कि सहारा समूह ने जनता के जमा पैसे से खरीदी गई कई संपत्तियों को गोपनीय नकद लेन‑देनों के जरिए बेच दिया है। विशेष पीएमएलए (धनशोधन रोकथाम अधिनियम) कोर्ट में छह सितंबर को दाखिल आरोपपत्र में ईडी ने अनिल वी.अब्राहम और जितेंद्र  प्रसाद वर्मा को आरोपी बताया है, जिन्हें इस मामले में गिरफ्तार किया जा चुका है और न्यायिक हिरासत में हैं।  
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अब्राहम सहारा समूह की मुख्य प्रबंधन टीम के कार्यकारी निदेशक थे, जबकि वर्मा प्रोपर्टी एजेंट थे और समूह के पुराने सहयोगी रहे हैं। ईडी ने कहा कि ये दोनों अन्य लोगों के साथ मिलकर इन संपत्तियों की बिक्री के कामों में सक्रिय रूप से भूमिका निभा रहे थे। जांच के दौरान पता चला कि जनता से एकत्र की गई राशि से खरीदी गई इन संपत्तियों को नकद लेन-देन के जरिये बेचा गया है। ईडी ने कहा कि अब्राहम और वर्मा ने ऐसी संपत्तियों की बिक्री की प्रक्रिया को आसान करने, तालमेल बनाने और क्रियान्वित करने में अहम योगदान दिया। 

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धनशोधन का यह मामला सहारा समूह की संस्थाओं के खिलाफ पुलिस की ओर से दर्ज करीब 500 प्राथमिकी के बाद सामने आया है, जिनमें 'हमारा इंडिया क्रेडिक कोऑपरेटिव सोसायटी लिमिटेड' (एचआईसीसीएसएल) नाम की कंपनी भी शामिल है। पुलिस शिकायतों में आरोप है कि जमाकर्ताओं के साथ बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी हुई। जमा की गई पूरी राशि तय समय पर नहीं लौटाई गईं, नई राशि लेने के लिए दबाव बनाया गया और समयसीमा पूरी होने पर भुगतान से इनकार किया गया। 
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ईडी ने यह भी दावा किया कि सहारा समूह ने एक पोंजी योजना के रूप में काम किया, जमा पैसे का गैरकानूनी तरीकों से प्रबंधन किया। इन जमा राशियों पर जो ब्याज या मूलधन लोगों को लौटाया जाना चाहिए था, वह वापस नहीं किया गया, बल्कि उसी पैसे को फिर से कहीं और निवेश कर दिया गया। इसके अलावा, कंपनी के दस्तावेजों में हेराफेरी की गई, ताकि यह दिखाया जा सके कि पैसा लौटा दिया गया है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं हुआ था। यह सब किया गया ताकि गैर-भुगतान (यानि असली भुगतान न करने) की बात छिपाई जा सके।

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