सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि उसकी पांच न्यायाधीशों की पीठ सबरीमला मामले में पुनर्विचार अधिकार क्षेत्र के तहत अपनी सीमित शक्ति का इस्तेमाल करते हुए कानून के प्रश्नों को वृहद पीठ को भेज सकती है।
प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे की अगुवाई वाली पीठ ने संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता एवं आस्था संबंधी मामलों पर सात प्रश्न तैयार किए, जिनकी सुनवाई नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ करेगी। पीठ ने कहा कि उसकी नौ न्यायाधीशों की पीठ संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के अधिकार के साथ इसके परस्पर प्रभाव एवं संबंध के मामले पर सुनवाई करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान लिंग और विश्वास मामले में मुद्दों को सामने रखा। सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता की गुंजाइश संबंधी प्रश्नों को लेकर 17 फरवरी से प्रतिदिन सुनवाई करने का प्रस्ताव रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम इस मामले की सुनवाई सप्ताह में पांच दिन होगी और आपको (वकीलों) उन तौर-तरीकों को खोजना होगा कि कौन बहस करेंगे और किस पक्ष के लिए करेंगे।
यह पीठ धार्मिक प्रथाओं के संबंध में न्यायिक पुनरीक्षा की सीमा और संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) में हिंदुओं के वर्गों के अर्थ पर भी सुनवाई करेगी। पीठ किसी विशेष धर्म या धर्म के सम्प्रदाय से संबंध नहीं रखने वाले व्यक्ति के जनहित याचिका दायर करके उस विशेष धर्म की धार्मिक आस्थाओं पर सवाल करने के अधिकार को लेकर भी सुनवाई करेगी।
यही नहीं, न्यायालय इस बात पर भी विचार करेगा कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी धर्म या धार्मिक पंथ विशेष का सदस्य नहीं होते हुए भी उस धर्म से जुड़ी धार्मिक आस्थाओं पर जनहित याचिका के माध्यम से सवाल उठा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे वकीलों को यह सूचित करने का निर्देश दिया कि वे किसका प्रतिनिधत्व कर रहे हैं और इसी के बाद पीठ उन्हें बहस के लिए समय आवंटित करेगी।
पीठ ने कहा कि केन्द्र की ओर से सालिसीटर जनरल तुषार मेहता 17 फरवरी को बहस शुरू करेंगे और उनके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता के परासरन बहस करेंगे। नौ सदस्यीय संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति आर भानुमति, न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति एम एम शांतानागौडर, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत शामिल हैं।