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Russia Ukraine News: पहली बातचीत में उम्मीद कम, लेकिन दूसरे दौर की वार्ता में ही सकारात्मक समाधान के आसार

शशिधर पाठक
Updated Mon, 28 Feb 2022 07:40 PM IST

सार

पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि रूस भी सैन्य कार्रवाई, धमकी और शांति वार्ता के जरिए कूटनीतिक खेल खेल रहा है। मुझे ऐसा लग रहा है कि आने वाले समय में वह नाटो के सदस्य देश लिथुआनिया, लातविया, इस्तोनिया समेत तमाम देशों को नाटो की सदस्यता से बाहर आने के लिए धमकाएगा, तंग करेगा। लातविया जैसे तमाम देश भी इसे अभी से महसूस करने लगे हैं...
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बेलारूस में यूक्रेन और रूसी प्रतिनिधिमंडल की बैठक - फोटो : Agency


पुतिन के जवाब में राष्ट्रपति जेलेंस्की अंतरराष्ट्रीय सेना का गठन करने और हथियार न डालने का संदेश दे रहे हैं। लातविया ने अपने नागरिकों को यूक्रेन की लड़ाई लड़ने की छूट दे दी है। नाटो के कुछ देशों ने यूक्रेन को सैन्य साजो-सामान और फाइजर जेट तक देने का प्रस्ताव किया है। हालांकि यह बात अभी भी समझ में नहीं आ रही है कि यह सैन्य साजो सामान यूक्रेन तक कैसे पहुंचेगा? क्योंकि रूस ने जमीन, आसमान और समुद्रे के रास्तों को अपनी निगरानी में रखा हुआ है। दूसरी तरफ, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने पुतिन की परमाणु हमले की तैयारी को खोखली धमकी बताया है।

दूसरे दौर की बातचीत से निकलेगा हल

शशांक कहते हैं कि दूसरे दौर की बातचीत में संघर्ष विराम, शांति और समझौते का रास्ता बन सकता है। शशांक के मुताबिक इस स्थिति में कोई बातचीत पहले दौर में दबाव में न आने के संदेश के साथ होती है। लेकिन इसे नहीं भूलना चाहिए कि यूक्रेन और रूस दोनों पर नागरिकों को हताहत होने से बचाने का दबाव है। रूस की मुख्य चिंता यूक्रेन को नाटो का सदस्य न बनने देने की है और इससे कम वह किसी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं दिखाई दे रहा है। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को इसका ठीक-ठीक अंदाजा है। इसलिए यूक्रेन के वार्ताकार अधिक से अधिक अनुकूल परिस्थिति तैयार करने की कोशिश करेंगे।

अमेरिका जानता है कि लड़ाई छोटी नहीं होगी

पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि लड़ाई अगर आगे बढ़ेगी तो छोटी नहीं होगी। यूक्रेन संकट के समाधान की तैयारी रूस 2008 से कर रहा है। 2014 में क्राइमिया को रूस में मिलाकर इसका संकेत उसने दिया था। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इसका काफी होमवर्क कर चुके हैं। इसलिए अभी जैसा भारतीय मीडिया में दिखाया जा रहा है, उससे कुछ अलग नतीजे आने की उम्मीद है। शशांक कहते हैं कि जो खबरें छनकर आ रही हैं, वह मीडिया के माध्यम से हैं। इसमें जमीनी हकीकत को लेकर न तो रूस बयान जारी कर रहा है और न ही यूक्रेन इस तरह की कोई बात कह रहा है। बेहतर है कि अभी कुछ इंतजार करना चाहिए।



शशांक कहते हैं कि लड़ाई हुई तो लंबी छिड़ेगी। यूक्रेन के साथ फिलहाल न तो नाटो देश खुलकर आ रहे हैं और न ही अमेरिका। बताते हैं कि रूस के साथ चीन, ईरान, अजरबैजान, सीरिया, बेलारूस, किर्गिस्तान समेत तमाम देश हैं। इसे नाटो भी समझ रहा है। शशांक कहते हैं कि यूरोपीय देशों ने भी रूस पर कोई ऐसा आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगाया, जिससे रूस की परेशानी बढ़े। अभी यूरोप को रूस से गैस, तेल आदि की आपूर्ति हो रही है। इसका भुगतान उसके पास जा रहा है। अमेरिका हालात पर नजर बनाकर आगे बढ़ रहा है। यूक्रेन में भी तमाम क्षेत्रों के दबंग नेता सबकुछ अपने हिसाब से तय करना चाह रहे हैं। इस तरह की स्थिति में तमाम तरह की अफवाह, प्रोपेगैंडा भी चलता रहता है।

अमेरिका और नाटो की रणनीति है कि लड़ाई लंबी खिंचे, रूस का खर्चा बढ़े

पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि अमेरिका और नाटो की रणनीति है कि यूक्रेन संकट लंबा खिंचे। इससे रूस की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान होगा। हालांकि शशांक का कहना है कि रूस ने इस तरह के हालात का अंदाजा लगाकर अपनी तैयारियां की होंगी। लेकिन रूस के साथ चीन खड़ा है। चीन के साथ मिलकर रूस अपने आर्थिक हितों को सहेजने की पूरी कोशिश करेगा। कुल मिलाकर रूस के पास प्राकृतिक गैस, तेल और खनिजों का भंडार है। यूरोप को इसकी बहुत आवश्यकता रहती है। ऐसा माना जा रहा है कि रूस दांव पर लगे अपने स्रोतों का भी आकलन कर रहा है। शशांक कहते हैं कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को यूरोप की कमजोरी पता है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैंक्रों और जर्मनी के चांसलर ओलाफ स्काल्ज का संतुलित होकर चलना इसका साफ संकेत कर रहा है।

रूस के 'खेल' से क्या बदलेगी जिओपॉलिटिक्स

पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि रूस भी सैन्य कार्रवाई, धमकी और शांति वार्ता के जरिए कूटनीतिक खेल खेल रहा है। मुझे ऐसा लग रहा है कि आने वाले समय में वह नाटो के सदस्य देश लिथुआनिया, लातविया, इस्तोनिया समेत तमाम देशों को नाटो की सदस्यता से बाहर आने के लिए धमकाएगा, तंग करेगा। लातविया जैसे तमाम देश भी इसे अभी से महसूस करने लगे हैं। शशांक कहते हैं कि अमेरिका के तमाम बड़े कारोबारियों की निगाह यूरोप की मांग पर टिकी है। अमेरिका के लोग चाहते हैं कि यूरोप गैस, तेल, खनिजों के लिए अमेरिका पर निर्भर हों। यूरोप के देशों को लग रहा है कि ऐसा हुआ तो उनके ऊपर अमेरिका, ब्रिटेन का दबदबा बढ़ता जाएगा। यह बदलाव यूरोपीय यूनियन को कमजोर कर देगा। इसलिए अभी तमाम दांव-पेंच बाकी हैं।



दूसरी तरफ यूरोप में चीन ने काफी कुछ दांव पर लगा रखा है। अमेरिका चीन के साथ व्यापार युद्ध लड़ रहा था। अब चीन को अमेरिकी दबाव से मुक्ति मिलती नजर आ रही है। शशांक कहते हैं कि अमेरिका को भी लग रहा है कि वह चीन से तो नहीं निपट सकता, लेकिन रूस को कमजोर कर सकता है। इसलिए इसी को केन्द्र में रखकर कोशिश चल रही है।  

भारत को रूस के साथ कुछ सौदे करने चाहिए

पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि प्रधानमंत्री आपदा को अवसर कहते हैं। यह कुछ मामलों में सही है। भारत को चीन के खिलाफ रूस का वीटो चाहिए। रूस तेजी से चीन के समर्थन के कारण उसके करीब हो रहा है। ऐसे समय में भारत को आने वाली चुनौती से बचने के लिए रूस के साथ तत्काल तेल, गैस, खनिज आदि के मामले में बड़े सौदे, समझौते करने चाहिए। वह कहते हैं कि बाद में यह कोशिशें मुश्किल भरी हो सकती हैं। पूर्व विदेश सचिव कहते हैं कि रूस की योजना अब यूक्रेन में उसके बंदरगाह आदि पर कब्जा करने की होगी।

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