साल 1947 में मध्यप्रदेश के इंदौर में जन्मे जोशी ने पश्चिमी महाराष्ट्र में बीए तक शिक्षा हासिल की है। सुरेश राव जोशी की जगह संघ में वे अपने उपनाम भैय्याजी के नाम से जाने जाते हैं। भैय्याजी 1975 में आएसएस के प्रचारक बने। 34 साल की सेवाओं के बाद उन्हें 2009 में संघ के सहकार्यवाह के रूप में चुना गया। वे करीब-करीब 12 वर्ष इस पद पर रहे। उन्होंने नार्थ ईस्ट समेत कई राज्यों में संघ के विस्तार में अहम भूमिका अदा की है।
एक वरिष्ठ संघ विचारक ने अमर उजाला को बताया कि 70 वर्ष से अधिक उम्र होने के बाद भी एक युवा की तरह वो काम करते थे। भैय्याजी के आने के बाद से संघ की शाखाओं में बढ़ोत्तरी हुई। उनके सर संघचालक मोहन भागवत के साथ बेहद मधुर संबंध हैं। संघ परिवार या संगठन में अगर किसी विषय पर दो मत है या मनमुटाव है तो उसे सुलझाने में जोशी को महारत हासिल है।
कर्मठ और मेहनती कार्यकर्ताओं की पहचान करना और उसे बड़े काम में लगाने के लिए जोशी पहचाने जाते हैं। आमतौर पर वे कम शब्दों में अपनी बात रखते हैं। लेकिन इस बात का भी पूरा ध्यान रखते हैं कि जो संदेश जिसे पहुंचाना है, वह सटीक तरीके से पहुंचे। कई बार उन्होंने अपनी ही सरकार पर कटाक्ष भी किया और बिना किसी परवाह के संघ का मत भी रखा।
एक अन्य वरिष्ठ प्रचारक अमर उजाला को बताते हैं कि भैय्याजी एक प्रयोगधर्मी स्वभाव के व्यक्ति हैं। वे हमेशा चाहते हैं कि एक विस्तृत योजना बनाकर हर क्षेत्र में कोई न कोई नया प्रयोग होता रहे। उनके द्वारा शुरू किए गए कई प्रयोग अगर कुछ अधूरे हैं या कुछ छूट गए हैं तो नए सरकार्यवाह पर जिम्मेदारी आ जाती है कि उन्हें जांचा जाए और उसे गति प्रदान की जाए।
उन्होंने आगे कहा कि ऐसे ही एक नए प्रयोग से भैय्याजी ने मुझे एक भी जोड़ा है। आज देश में मठ और आश्रम हैं। इनके द्वारा होने वाले सेवा कार्यों की जिम्मेदारी आम समाज के लोगों को बहुत ही कम है। इसलिए वे चाहते हैं कि विभिन्न स्थानों पर मेले आयोजित कर लोगों को इनकी जानकारी दी जाए। अभी तक देश में एकमात्र संगठन चेन्नई में काम कर रहा था, लेकिन उसको देशव्यापी बनाने का प्रयोग भैय्याजी ने शुरू किया। पिछले पांच वर्षों में ये प्रयोग बेहद ही सफल भी रहा है। मेला आयोजन के काम अभी कोरोना संक्रमण की वजह से रुका हुआ है। हालांकि अभी तक 15 से ज्यादा स्थानों पर हम मेले का आयोजन भी कर चुके हैं।