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आरएसएस या 2019 से पहले मोहन भागवत का राष्ट्रीय सेकुलर संघ?

Thu, 27 Sep 2018 02:24 AM IST
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Mohan Bhagwat
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आरएसएस से भाजपा के महासचिव बने राम माधव ने सरसंघ चालक मोहनराव मधुकरराव भागवत (मोहन भागवत) की दो दिन की व्याख्या और एक दिन के सवाल जवाब को ग्लासनोस्त की संज्ञा भले दे दी, लेकिन इसने संघ के प्रचारकों, कार्यकर्ताओं और जमीनी लोगों में हलचल पैदा कर दी है। 

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संघ के एक विख्यात चिंतक को तब बड़ा आश्चर्य हुआ, जब सरंसघ चालक का विज्ञान भवन में कार्यक्रम समाप्त होने के बाद संघ के जानकार का फोन आया। फोन में संघ के चिंतक से पहला सवाल यही पूछा गया कि सरसंघ चालक आरएसएस को राष्ट्रीय सेकुलर संघ (आरएसएस) क्यों बनाना चाहते हैं?

गोरक्षा आंदोलन के राष्ट्रीय समन्वयक सुरेन्द्र सिंह बिष्ट ने भी यह जानना चाहा है कि आरएसएस के पास सत्ता के लिए इतनी अनुकूलता बनाने की कौन सी मजबूरी है। सर संघचालक इतनी हड़बड़ी में क्यों हैं? चुनाव के दौरान ईवीएम में नोटा को लेकर सरसंघ चालक इतने राजनीतिक क्यों हो गए? जबकि संघ राष्ट्रीय विचारों से ओत-प्रोत एक राष्ट्रीय सामाजिक, सांस्कृतिक गैर राजनीतिक संगठन है। 
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संघ के भीतर भी इसको लेकर बहस की स्थिति है। संघ के विचारक का भी आचार्य को जो जवाब था, वह और चौंकाने वाला है। उन्होंने कहा कि यह सरसंघ चालक मोहनराव मधुकरराव भागवत का संघ है। यह नोटा से आतंकित है। यह 2019 का चुनाव लड़ने की कगार पर खड़ा है। यह संघ गुरु गोलवरकर के विचार को सीधे खारिज करके आने वाले समय में नये सरसंघ चालक के लिए इस तरह की नई परंपरा की नींव डाल रहा है। पहले संघ परिवार में मोदी थे और अब मोदी परिवार में संघ है। अर्थात संघ का नया चेहरा सोशियो पॉलिटिकल न होकर पॉलिटिकल सोशल हो गया है।  

 

सरसंघ चालक के बयान का स्वागत किया जाना चाहिएः राम बहादुर राय

20 सदस्यीय इंदिरागांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र बोर्ड के प्रमुख रामबहादुर राय पद्मश्री से सम्मानित, वरिष्ठ पत्रकार और आरएसएस की संस्कृति, विचारधारा से भली-भांति परिचित हैं। राय का कहना है कि यह संघ का दूसरा सुनहरा समय है, जब पूरा संघ एक है। संघ के शीर्ष नेतृत्व में कोई विवाद नहीं है। सुलझा नेतृत्व है। ऐसा समय इससे पहले बालासाहब देवरस के समय में था। इसके पहले तथा डा. हेडगेवार के  समय के बाद ऐसी स्थिति देखने में नहीं आई।

-हर सरसंघ चालक ने मूल तत्व को बनाए रखकर बदलाव किए हैं। सरसंघ चालक ने भी पंडित दीन दयाल उपाध्याय के संविधान को स्वीकारने के पक्ष को आगे बढ़ाया है। राम बहादुर राय का कहना है कि संविधान निर्माण के दिनों में पंडित दीन दयान ने चार-पांच लेख लिखे थे। आखिरी लेख में लिखा था कि इस संविधान का क्या करें? लेकिन अंत में कहा था कि जो संविधान हमें मिला है, उसे स्वीकार करना चाहिए। दीन दयाल उपाध्याय जी की जन्मशती चल रही है और उनकी उस सोच को आरएसएस प्रमुख ने आगे बढ़ाया है। संघ प्रमुख के इस प्रयास पर कोई विवाद नहीं है, इसलिए इसे सुलझा हुआ नेतृत्व कहा जा सकता है।

-दत्तोपंत ठेंगड़ी भी अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के गठन के समय इलाहाबाद में संविधान पर 100 सवाल  खड़े कर चुके हैं और अटल बिहारी वाजपेयी ने भी संविधान की समीक्षा पर जोर दिया था।

-हिन्दुत्व-हिन्दुत्व और इसमें मुसलमान को स्थान देने को लेकर संघ की राय पहले भी रही है। पूर्व सरसंघ चालक सुदर्शन जी भी ऐसा कहते रहे हैं।
-मोहन भागवत ने कहा कि जो मैं बोल रहा हूं, वह संघ की सहमति से बोल रहा हूं।

राय ने कहा उपरोक्त सभी तथ्यों पर गौर और इसे स्वीकारते हुए कि 2019 में लोकसभा चुनाव होना है, समय बदल रहा है और मोहन भागवत शासक वर्ग के अभिभावक हैं, मेरी राय है कि सरसंघ चालक के बयान का स्वागत किया जाना चाहिए। वह किसी भ्रम में नहीं रख रहे हैं। वह समस्या को उलझाने की बजाय इसे सुलझाने की तरफ ले जा रहे हैं।
संघ परिस्थिति सापेक्ष हैः दीनानाथ बत्रा

संघ के प्रचारक दीनानाथ बत्रा शिक्षा के आंदोलन से जुड़े रहे हैं। बत्रा का कहना है कि परिस्थिति सापेक्ष संघ है। सरसंघचालक मोहन भागवत ने नई परिस्थिति के अनुरुप ढालने की कोशिश की है। कॉमन सिविल कोड हो या इतनी संख्या में देश में रहने वाले मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने का उद्देश्य, उन्होंने इसका समाधान बताया है। 

यह बात सही है कि गुरु गोलवरकर ने अपनी किताब में लिखा है कि मुसनमान हमारे दुश्मन हैं। हम यही मानते आए। हमने मुसलमानों को शत्रु और हिन्दुत्व के लिए खतरा माना। लेकिन सर संघचालक ने इस देश में रहने वाले हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई सबके साथ मिलकर रहने, चलने का समाधान दिया है। उन्होंने कहा भी कि गुरु गोलवरकर द्वारा मुसलमानों को दुश्मन बताने वाले अंश को निकाल कर संघ की सोच को अपडेट कर दिया गया है। अब आप लोग (संघ के प्रचारक, कार्यकर्ता, स्वयंसेवक) मुसलमान समेत अन्य धर्मों के अनुयाइयों, लोगों से संबंध बढ़ाइए। मिलिए, जुलिए उन्हें अपने से जोडि़ए।
 

संघ के विचारक का सवाल

सरसंघ चालक के पद की अवमानना, उसके अवमूल्यन और अपमान का साहस न कर पाने के कारण संघ के आजीवन विचारक रहे सूत्र ने अपना पक्ष ऑफ रिकार्ड दिया है। सूत्र का कहना है कि संघ का ढांचा है। यह सरसंघ चालक द्वारा ली गई नई लाइन पर चर्चा करेगा, लेकिन उसका पालन भी करेगा। लेकिन संघ के ढांचे के बाहर जो संघ से जुड़ा करीब साठ लाख से अधिक लोगों को दायरा है, उसका भ्रम बढ़ गया है। 

वह नहीं समझ पा रहा है कि जिस मुसलमान को वह शत्रु मानता आया, उसके विरोध में बोलता, सामाजिक अभियान चलाता आया उसे कैसे एक झटके में तिलांजलि दे दे। संघ के ग्रीष्म ऋतु शिविर के दौरान संघ का पदाधिकारी हर संघ में शामिल होने वाले घटक को प्रतिज्ञा दिलाता है। इस प्रतिज्ञा में वह कहता है कि अपने पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, हिन्दू समाज का संरक्षण और हिन्दू राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति के लिए संघ का घटक बना हूं।

संघ के चिंतक का कहना है कि यह चारों सत्य, प्रतिज्ञा का क्या होगा? क्योंकि इन सबके अलग-अलग अर्थ हैं। सरसंघ चालक ने इन सभी को एक झटके में धोखा बता दिया है।
 

भारत की शास्त्रीय परंपरा के विरुद्ध विचार

संघ के चिंतक का कहना है कि सरसंघ चालक मोहन भागवत का विचार भारत की शास्त्रीय परंपरा के विरुद्ध है। वह गुरु गोलवरकर के विचार पर सवाल उठाकर उनके कहे अंश को खारिज कर रहे हैं। उनका यह कहना सरासर अनुचित है कि गुरु गोलवरकर की किताब बंच ऑफ थॉट की बजाय रंगाहरि की किताब को सही माना जाए। जबकि दंतोपंत ठेंगड़ी ने सत्तर के दशक में एक प्रसंग में कहा था कि हम सबके बीच में कोई गुरु जी से बुद्धिमान है क्या? 
यशवंतराव केलकर ने 1983 में संघ में एकवाच्यता पर जोर दिया था। भारत की परंपरा तेनोक्तम (उन द्वारा कहा गया) पर आधारित है। भगवद्गीता में स्वयं भगवान कृष्ण ने कुछ नहीं कहा है। दो संदर्भ और ले लीजिए। रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद पर पुस्तक प्रकाशित करना चाहता था।

सरकार ने शर्त रखी कि इसमें हिन्दू मोंक (हिन्दु साधु) जहां लिखा है, उसमें बदलाव कर दिया जाए। ऐसा हुआ। मिशन ने बात मान ली। दूसरा संदर्भ आचार्य अरविंद से जुड़ा है। वहां यह शर्त ठुकरा दी गई। बिना सरकारी सहायता के पुस्तक छपी। कहने का अशय यह कि भारत में यह नहीं चलता। 

गुरु के कथन नहीं बदले जाते। आज गुरु गोलवरकर का विचार बदला जाएगा तो कल कोई मोहन भागवत का भी बदलेगा। सरसंघचालक पद के लिए यह गरिमा के अनुरुप नहीं। इसी के कारण अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर प्रवीण तोगडिय़ा तक हिन्दू धर्म की इतनी छटाएं दिखती हैं।


संघ के तीन प्रणेता

संघ ने समय-समय पर खुद को बदला है लेकिन यह बदलाव मूल तत्व को बनाए रखकर हुआ है। डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने रिवोल्यूशनरी संगठन के रूप में आगे बढ़ाया, क्योंकि वह पहले विश्वयुद्ध के बाद मानकर चल रहे थे कि परिस्थितियां भारत में 1957 जैसे हालात पैदा करेंगी। तब हम एक नहीं हो पाए थे और अब यह चूक नहीं होनी चाहिए। गुरु गोलवरकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आध्यात्मिक, सांस्कृतिक स्वरूप दिया। इसलिए वह सेमीमिलिट्री के कांसेप्ट को महत्वपूर्ण मान रहे थे। बालासाहब देवरस के समय में बिना किसी विवाद के भाजपा बनी। संघ का स्वरूप सोशल बना।

मोहन भागवत

सरसंघ चालक बदलाव के चौथे वाहक हैं। संघ के चिंतक ने भागवत की तुलना संत विनोबा भावे से की है। कहा कि जिस तरह से विनोबा भावे ने सत्ता के विरुद्ध आंदोलन की धार कुंद करके सत्ता प्रतिष्ठान का साथ दिया, उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए सरसंघ चालक मोहन भागवत ने आरएसएस को सोशियो पॉलिटिक (सामाजिक राजनीतिक ) संगठन का रूप देने की बजाय राजनीतिक सामाजिक संगठन का रूप दे दिया है क्योंकि संघ की पूरी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। संघ समझकर चल रहा है कि यदि 2019 में भाजपा की केन्द्र सरकार में वापसी नहीं हुई तो उसे बड़ा नुकसान होगा। इसलिए स्थिति यह है कि अभी तक जो नरेन्द्र मोदी संघ परिवार में होते थे, वह संघ अब मोदी परिवार में है।

 
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प्रतिष्ठा दांव पर

राम बहादुर राय और दीनानाथ बत्रा को यह मानने में गुरेज नहीं है कि 2019 में लोकसभा चुनाव होना है। यह चुनाव महत्वपूर्ण है। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। राय साफ कहते भी है कि यह तो सामने है। चुनाव होना है। भाजपा चुनाव में होगी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत शासक वर्ग के अभिभावक हैं। 

बत्रा का कहना है कि परिस्थितियां बदल रही हैं। बदलाव भी जरूरी है। संभवत: इसीलिए सरसंघ चालक ने पहली बार संघ की अवधारणा में आमूलचूल परिवर्तन को समझाने, देश के सामने रखने और नई व्याख्या को आगे बढ़ाने के लिए नई दिल्ली के विज्ञान भवन को चुना। 

मुख्य गेट पर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के संघ के बारे में विचार को स्थान दिया गया। आरक्षण पर बोले। गुरु गोलवरकर की किताब से मुसलमान को दुश्मन मानने वाले अंश को हटाने की जानकारी दी। कांग्रेस की स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में भूमिका की तारीफ की और सेक्युलर सोच पर आए। माना जा रहा है कि 2019 के आम चुनाव में भी संघ अपनी भूमिका में अभी से बदलाव का संकेत दे रहा है।
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