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RSS: दत्तात्रेय होसबोले ने कहा, 'नैरेटिव' भारतीय संस्कृति का शब्द नहीं

Fri, 28 Jul 2023 07:28 PM IST
Harendra Chaudhary डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

दत्तात्रेय ने कहा कि मुगलों की लंबी गुलामी के बाद भी भारतीय जनमानस ने कभी उन्हें स्वयं से श्रेष्ठ नहीं माना। लेकिन अंग्रेजों के शासनकाल में कुछ लोगों ने इस तरह की कहानी गढ़ी, जिससे आम लोग स्वयं को कमजोर और उपेक्षित महसूस करने लगे। लोगों को अपनी ही संस्कृति की महानता के विषय में संदेह होने लगा...
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वरिष्ठ पत्रकार बलबीर पुंज के साथ केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और RSS नेता दत्तात्रेय होसबोले। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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आरएसएस के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि नैरेटिव भारतीय संस्कृति का शब्द नहीं है। उन्होंने कहा कि यहां विभिन्न विषयों में विमर्श होता है, लेकिन इसे नैरेटिव नहीं कहा जा सकता। यह विचारों के आदान-प्रदान पर आधारित स्वस्थ परंपरा है। उन्होंने कहा कि यदि भारत को समझना है, तो लोगों को संस्कृत का अध्ययन करना चाहिए।

दत्तात्रेय ने कहा कि मुगलों की लंबी गुलामी के बाद भी भारतीय जनमानस ने कभी उन्हें स्वयं से श्रेष्ठ नहीं माना। लेकिन अंग्रेजों के शासनकाल में कुछ लोगों ने इस तरह की कहानी गढ़ी, जिससे आम लोग स्वयं को कमजोर और उपेक्षित महसूस करने लगे। लोगों को अपनी ही संस्कृति की महानता के विषय में संदेह होने लगा। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद इस सोच से बाहर आना चाहिए था, लेकिन एक विशेष सोच से प्रभावित लोगों ने अपनी संस्कृति को कमजोर करके दिखाया जिससे हमें नुकसान हुआ।

उन्होंने कहा कि यही एक नैरेटिव था, जिसमें भारतीय संस्कृति की हर बात को अवैज्ञानिक बताया जाने लगा। नई शिक्षा पद्धति से पढ़े लिखे कई वैज्ञानिक, शिक्षक, पत्रकार, न्यायमूर्ति और अन्य पढ़े लिखे लोगों ने इस नैरेटिव को स्वीकार कर लिया। अब इस नैरेटिव से बाहर आने की आवश्यकता है।

आरएसएस नेता के अनुसार, कई संदर्भों में लगातार नए-नए नैरेटिव खड़े किए जा रहे हैं। लेकिन यदि जनता तक सत्य को पहुंचाना है तो इसके लिए आम जनता की भाषा में लोगों को सामग्री उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

जयप्रकाश नारायण के हवाले से उन्होंने कहा कि पंचायत व्यवस्था का मूल धर्म रहा है। लेकिन एक सोच विशेष के कारण धार्मिक होने को कमजोर और पिछड़े हुए के तौर पर प्रचारित किया गया। उन्होंने कहा कि ऐसे नैरेटिव को तोड़ने के लिए सही सोच को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके लिए सबसे पहले अपनी धर्म-संस्कृति को समझने की आवश्यकता है।

नैरेटिव भारतीय शब्द नहीं

अपनी पुस्तक 'नैरेटिव का मायाजाल' के लोकार्पण के अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार बलबीर पुंज ने कहा कि भारतीय संस्कृति में नैरेटिव जैसा कोई शब्द नहीं है। भारतीय संस्कृति सत्य या असत्य को समझती है, लेकिन नैरेटिव शब्द का अर्थ है कि किसी घटना को सही या गलत की बजाय अपनी सुविधा के अनुसार किसी विचारधारा विशेष के अनुरूप पेश करना। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य है कि आज यही हो रहा है। इन नैरेटिव से निपटना बड़ी चुनौती है।

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