भागवत ने कहा कि भारत हजारों साल से विद्यमान है। यहां तपस्या का महत्त्व है। जो व्यक्ति स्वयं को प्राप्त कर लेता है, उसे यह समझ आ जाता है कि कोई पराया नहीं है, और सबके लिए निःस्वार्थ भाव से सेवा करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य अपने बच्चों की सेवा करते हैं। लेकिन इसके पीछे कोई कांट्रैक्ट नहीं होता कि वे बड़े होकर उनकी भी सेवा करेंगे। लेकिन बच्चे बाद में समझते हैं कि उन्हें भी अपने माता-पिता की सेवा करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि निःस्वार्थ भाव से की गई सेवा लोगों को एक दूसरे से जोड़ती है।
श्री श्री रविशंकर ने कहा कि डॉ. मोहन भागवत कर्मनिष्ठ और सेवा में समर्पित हैं। वे अपना पूरा समय देश-समाज के लिए देते हैं। उन्होंने कहा कि भागवत के मार्गदर्शन से करोड़ों लोग देशभक्ति और धर्म की स्थापना में लगे हैं। उन्होंने कहा कि आरएसएस पिछले सौ साल से देश की सनातन धरोहर को बचाने का काम कर रहा है, और यह कार्य आगे बढ़ते रहना चाहिए।