भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को अपना वैचारिक मार्गदर्शक मानने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शीर्ष नेता भले ही ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ की बात करते हो, लेकिन संघ प्रमुख मोहन भागवत इससे इत्तफाक नहीं रखते। भागवत की नजर में ये संघ की भाषा नहीं है बल्कि एक राजनीति नारा है। संघ के समावेशी चरित्र के बारे में बताते हुए भागवत ने रविवार को ये बात कही।
एक किताब के विमोचन के मौके पर उन्होंने कहा, ये सब राजनीतिक नारे हैं। आरएसएस की ये भाषा नहीं है। मुक्ति शब्द राजनीति में उपयोग होता है। हम कभी किसी को अलग करने की भाषा का उपयोग नहीं करते। हमें राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में हर किसी को शामिल करना है, उन्हें भी, जो हमारा विरोध करते हैं।
फरवरी में संसद में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वे महात्मा गांधी का ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का सपना पूरा कर रहे हैं और सबसे पुराने दल पर आरोप लगाया था कि जब वह सत्ता में होती है तो देश के विकास की कीमत पर गांधी परिवार की चाटुकारिता में लगी रहती है।
विदेश मंत्रालय में पासपोर्ट, वीजा एवं विदेशी भारतीय मामलों के सचिव डी. मुले की लिखी छह किताबों का विमोचन करने आए भागवत ने बदलाव के लिए सकारात्मक मानसिकता की जरूरत पर जोर दिया। संघ प्रमुख ने कहा कि नकारात्मक सोच वाले सिर्फ विवाद और बंटवारे की बात ही सोच सकते हैं।