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Mohan Bhagwat: 'भारत का उदय विश्व में शांति और समृद्धि लाएगा', बोले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत

Tue, 16 Jun 2026 12:32 AM IST
Devesh Tripathi पीटीआई, नई दिल्ली

सार

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत का वैश्विक नेतृत्व उसकी सभ्यतागत विरासत, नैतिक मूल्यों और लोककल्याण की भावना पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में भारत विश्व मंच पर अग्रणी भूमिका निभा सकता है, बशर्ते उसकी शक्ति का उपयोग मानवता के हित में हो। भागवत ने युवाओं में सेवा, राष्ट्रभक्ति और चरित्र निर्माण के संस्कार विकसित करने पर जोर दिया।
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने सोमवार को कहा कि भारत का विश्वगुरु के रूप में उभार उसकी सभ्यतागत मूल्यों से प्रेरित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य दुनिया में शांति और समृद्धि लाना होना चाहिए। उन्होंने श्रम की गरिमा, समृद्धि के समान वितरण, नैतिक तरीके से धन सृजन और राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका पर भी जोर दिया।
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हीरो एंटरप्राइज द्वारा आयोजित 18वें बीएमएल मुंजाल पुरस्कार समारोह में भागवत ने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक ऐसी सभ्यता है जिसने आक्रमणों, विदेशी शासन और ऐतिहासिक उतार-चढ़ावों के बावजूद अपनी पहचान बनाए रखी है।

भारत एक अस्तित्व और सभ्यतागत पहचान का नाम : आरएसएस प्रमुख
मोहन भागवत ने कहा, "गंगा हजारों वर्षों से बह रही है। वह प्राचीन है, लेकिन उसमें बहने वाला जल हमेशा नया होता है। गंगा शाश्वत भी है और निरंतर नवीन भी। भारत भी शाश्वत है और निरंतर नवीन है। भारत केवल एक भूभाग का नाम नहीं है। भारत एक अस्तित्व और सभ्यतागत पहचान का नाम है।" भागवत ने कहा कि भारत की प्रगति का लाभ केवल देश को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को मिलेगा।
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उन्होंने कहा, "जब भारत उठता है तो केवल भारत को लाभ नहीं होता। जब भारत आगे बढ़ता है तो दुनिया में शांति और सुख का प्रसार होता है। एक प्रयास से तीन उद्देश्यों की पूर्ति होती है- व्यक्ति का कल्याण, राष्ट्र का कल्याण और आने वाली पीढ़ियों का कल्याण।" देश के भविष्य को लेकर विश्वास जताते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले दशकों में भारत वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में उभर सकता है।

भागवत ने कहा, "मेरा मानना है कि अगले 20 से 30 वर्षों में भारत दुनिया का नंबर एक राष्ट्र बनेगा। भारत विश्वगुरु बनेगा। वह शक्तिशाली बनेगा, लेकिन अपनी शक्ति का उपयोग विश्व कल्याण के लिए करेगा। भारत मानवता का मार्गदर्शक बनेगा। यही हमारी परिकल्पना है।" उन्होंने कहा कि भारत को अपनी युवा पीढ़ी को सेवा, देशभक्ति और चरित्र जैसे मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार करना होगा।

युवाओं को तैयार करने पर दिया जोर
आरएसएस प्रमुख ने कहा, "यह अवसर हमारे सामने है। हमें इसके लिए लोगों को तैयार करना होगा। उनमें परिश्रम और सेवा की भावना जगानी होगी। भारत को मजबूत बनाने की आकांक्षा पैदा करनी होगी।" उन्होंने कहा, "आने वाली पीढ़ी सेवा, देशभक्ति और चरित्र के मूल्यों को आगे बढ़ाएगी। हमें अपने जीवन और आचरण से उन्हें मार्ग दिखाना होगा।"

उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय क्षरण और अस्थिर उपभोग जैसी वैश्विक चुनौतियों के समाधान में भारत की सोच उपयोगी हो सकती है। उन्होंने कहा, "पृथ्वी मानवता का भरण-पोषण कर सकती है, लेकिन लालच असंतुलन पैदा करता है। यदि हर भारतीय औसत अमेरिकी के स्तर पर संसाधनों का उपभोग करने लगे तो पृथ्वी पर्याप्त नहीं होगी। हमें केवल अपने बारे में नहीं, बल्कि दूसरों के बारे में भी सोचना होगा।"

भारत को नहीं करनी चाहिए अन्य देशों की नकल :भागवत
भागवत ने कहा कि भारत को अन्य देशों की नकल नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा, "अगर भारत महाशक्ति बनकर अमेरिका या अन्य शक्तिशाली देशों की तरह व्यवहार करने लगे, तो वह भारत नहीं रहेगा। जब भारत जागृत और सक्षम बनता है, तब दुनिया में शांति और सुख आता है। लोगों के बीच संबंध अधिक सौहार्दपूर्ण और शांतिपूर्ण बनते हैं।"

उन्होंने कहा कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने में भारत की एक विशिष्ट भूमिका है। भागवत ने कहा, "दुनिया अपनी अनेक समस्याओं के समाधान खोज रही है। कुछ मुद्दों का समाधान अन्य स्थानों पर सफलतापूर्वक हुआ है, लेकिन कुछ ऐसे अधूरे कार्य हैं जिन्हें केवल भारत ही अपनी सभ्यतागत बुद्धिमत्ता के बल पर पूरा कर सकता है।"

धन और अवसरों के समान वितरण की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि समृद्धि कुछ हाथों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने कहा, "हमें भरपूर समृद्धि पैदा करनी चाहिए। अधिशेष का निर्माण करना चाहिए। लेकिन वह समृद्धि सभी के हाथों तक पहुंचनी चाहिए। बड़े पैमाने पर उत्पादन महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता द्वारा उत्पादन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी राष्ट्र की वास्तविक संपदा उसके प्राकृतिक संसाधनों और उसके मेहनती लोगों में निहित होती है।"

श्रम की गरिमा पर भागवत ने दिया जोर
श्रम की गरिमा पर जोर देते हुए भागवत ने कहा कि ईमानदार मेहनत और शारीरिक श्रम को समाज में अधिक सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा, "कड़ी मेहनत का सम्मान होना चाहिए। आज कई लोग शारीरिक श्रम से बचते हैं और केवल सुरक्षित नौकरियों की तलाश करते हैं। यह सोच बदलनी होगी। श्रम सम्मान का पात्र है। ईमानदार काम सम्मान का हकदार है।"

उन्होंने कहा, "हमें आने वाली पीढ़ियों को सिखाना होगा कि कड़ी मेहनत गर्व की बात है। श्रम का सम्मान किए बिना 1.4 अरब लोगों का देश समृद्ध नहीं बन सकता।" आरएसएस प्रमुख ने नैतिक तरीके से धन सृजन और आय के जिम्मेदार उपयोग पर भी बल दिया।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का कार्य कोई एक संगठन, राजनीतिक दल या व्यक्ति अकेले पूरा नहीं कर सकता। इसके लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है, ताकि एक समृद्ध, नैतिक और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार भारत का निर्माण किया जा सके।
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