राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को हिंदू समाज को एकजुट करने के महत्व पर जोर दिया क्योंकि यह देश का ‘‘जिम्मेदार’’ समाज है जो मानता है कि एकता में ही विविधता समाहित है।
उन्होंने विश्व की विविधता को स्वीकार करने के महत्व पर भी बल दिया। उन्होंने कहा, "भारत सिर्फ भूगोल नहीं है; भारत की एक प्रकृति है। कुछ लोग इन मूल्यों के अनुसार नहीं रह सके और उन्होंने एक अलग देश बना लिया। लेकिन जो लोग स्वाभाविक रूप से यहीं रह गए, उन्होंने भारत के इस सार को अपना लिया। और यह सार क्या है? यह हिंदू समाज है, जो दुनिया की विविधता को स्वीकार करके फलता-फूलता है। हम कहते हैं 'विविधता में एकता', लेकिन हिंदू समाज समझता है कि विविधता ही एकता है।"
हिंदू एकता की आवश्यकता दोहराते हुए भागवत ने कहा कि अच्छे समय में भी चुनौतियां हमेशा सामने आती रहेंगी। उन्होंने कहा, "समस्या की प्रकृति अप्रासंगिक है; महत्वपूर्ण यह है कि हम उनका सामना करने के लिए कितने तैयार हैं।" यह कार्यक्रम कलकत्ता उच्च न्यायालय की मंजूरी दिए जाने के बाद आयोजित की गई थी, क्योंकि बंगाल पुलिस ने शुरू में इसकी अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
सिकंदर से लेकर अब तक हुए ऐतिहासिक आक्रमणों पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि "कुछ मुट्ठीभर बर्बर लोगों ने, जो गुणों में श्रेष्ठ नहीं थे, भारत पर शासन किया, तथा समाज में विश्वासघात का चक्र जारी रहा। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत का निर्माण अंग्रेजों ने नहीं किया था तथा तर्क दिया कि भारत के विखंडित होने की धारणा अंग्रेजों ने लोगों के मन में डाली थी।