प्रणब मुखर्जी को बुलाए जाने पर भागवत ने साफ किया कि संघ की परंपरा रही है कि हम देश के सज्जनों को आमंत्रित करते हैं। इस बार कुछ विशेष चर्चा चली। इसका कोई अर्थ नहीं है। यह वैसे ही हुआ है जैसे हर साल होता है। संघ और प्रणब मुखर्जी वही रहेंगे जो पहले थे। संघ संपूर्ण समाज को संगठित करना चाहता है। इसलिए हमारे लिए कोई पराया नहीं है। भारत की धरती पर जन्मा प्रत्येक व्यक्ति भारत का पुत्र है। देशभक्ति करना उसका काम है। केवल पोषण और आजीविका के लिए प्रकृति ने हमें साधन नहीं दिए हैं। भाषाओं और पंथों की विविधता तो पहले से ही है। विविधता होना सुंदरता है। विविधता के बीच एकता ही हमारी संस्कृति है। यह सारे विश्व और स्वार्थ के भेद मिटाकर सुख शांति पूर्ण जीवन देने वाली भूमि है। मत-मतांतर तो होते ही रहते हैं। लेकिन इन सब बातों की एक मर्यादा है। अंतत: हम सब भारत माता के पुत्र हैं। हम सब मिलकर इसका भाग्य बदल देंगे। हेडगेवार ने कांग्रेस के आंदोलनों में दो बार भाग लिया। आजादी के आंदोलन में क्रांतिकारियों का साथ दिया। उन्होंने नेता जी सुभाष चंद्र बोस का भी जिक्र किया।
संगठित समाज ही देश का भाग्य बदल सकता है
किसी राष्ट्र का भाग्य बनाने वाले समूह नहीं होते हैं। सरकारें बहुत कुछ कर सकती हैं लेकिन सब कुछ नहीं कर सकती हैं। जब तक देश का सामान्य समाज गुणसंपन्न होकर देश के लिए पुरुषार्थ करने के लिए तैयार नहीं होता है तब तक सारे दल और समूह भी कुछ नहीं कर सकते हैं। हम सब एक हैं, सबके पूर्वज एक हैं। यह किसी को तुरंत समझ में आ जाता है लेकिन किसी-किसी को कुछ मालूम ही नहीं है। अपने संकुचित भेद छोड़कर इस भेद को हम सब समझ लें तो इस सनातन समाज को समृद्ध बनाया जा सकता है। संगठित समाज ही देश का भाग्य बदल सकता है।
किसी भी कार्य को करने के लिए शक्ति चाहिए। शक्ति संगठन में होती है। सबके मिलकर काम करने में होती है। अगर शक्ति को शील का आधार नहीं रहा तो वह शक्ति दानवी शक्ति बन जाती है। विद्या प्राप्त लोग विवाद में समय गंवा देते हैं। धनपति उसके मद में ही चूर रहते हैं। जबकि शक्ति संपन्न लोग इसका इस्तेमाल दूसरों को परेशान करने के लिए करते हैं। जबकि विद्या का इस्तेमाल ज्ञान के प्रसार में होना चाहिए। पांच गुणों के आधार पर संघ के कार्यकर्ता अपना जीवन बिताते हैं। इसी आधार पर संघ अपने प्रति प्रतिकूलता के वातावरण को अनुकूलता में बदलने में कामयाब रहा है।