देश में नक्सलवाद के खात्मे की तिथि 31 मार्च 2026 रखी गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि इस तिथि तक देश के सभी इलाकों से नक्सलवाद का पूर्ण खात्मा हो जाएगा। 'लाल आतंक' के स्थायी खात्मे के बाद, नक्सली दोबारा से सिर न उठा सकें, इसके लिए केंद्र सरकार माओवाद से प्रभावित क्षेत्रों में 'सुरक्षा संबंधी व्यय' (एसआरई) के बजट को बढ़ा रही है। इस बार के केंद्रीय बजट में 3610.80 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। इसके जरिए नक्सली हिंसा के पीड़ितों को सहायता देना, आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के पुनर्वास और उन क्षेत्रों में तैनात पुलिस बलों के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा।
बता दें कि 'सुरक्षा संबंधी व्यय' योजना, भारत सरकार की एक केंद्रीय योजना है, जो वामपंथी उग्रवाद या ऐसी ही दूसरी स्थिति से प्रभावित राज्यों में राहत और पुनर्वास गतिविधियों पर हुए खर्चों की प्रतिपूर्ति प्रदान करती है। यह योजना, सौ प्रतिशत केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित है। छत्तीसगढ़ में उच्च रैंक वाले जो नक्सली सरेंडर कर रहे हैं, उन्हें राज्य सरकार पांच लाख रुपये की मदद दे रही है। मध्य/निम्न रैंक वालों को ढाई लाख रुपये की आर्थिक मदद मिलती है। इसके अलावा 36 महीने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए 10 हजार रुपये मासिक वजीफा दिया जा रहा है।
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नक्सल प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ और इसकी विशेष इकाई 'कोबरा' महज 48 घंटे में नया फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (एफओबी) स्थापित कर रही है। जिस तरह से 31 मार्च की डेडलाइन करीब आ रही है, नक्सलियों के पास दो ही विकल्प बचे हैं। पहला, सरेंडर कर मुख्यधारा में शामिल हो जाएं या फिर सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ के लिए तैयार रहें। इस चेतावनी का असर भी हो रहा है। पिछले साल लगभग 1300 नक्सलियों ने सरेंडर कर दिया था। इतना ही नहीं, 700 से ज्यादा नक्सली गिरफ्तार किए गए।
अब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शांति बहाल होने के बाद संबंधित राज्य सरकारों के समक्ष बड़ी चुनौती ये रहेगी कि वहां विकास का दौर तेजी से प्रारंभ हो। वहां अकेला विकास नहीं, बल्कि सुरक्षा केंद्रित विकास पर फोकस करना होगा। इसी वजह से केंद्रीय बजट 2026-27 में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के 'सुरक्षा संबंधी व्यय' में बढ़ोतरी की गई है।
डॉ. पीएम नायर, आईपीएस (रिटायर्ड डीजी एनडीआरएफ, एडीजी सीआरपीएफ 'ऑपरेशन') का कहना है कि नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे के बाद सरकारों को निश्चिंत होकर नहीं बैठना है। संबंधित राज्य, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में सरकारों की चुनौती बढ़ जाएगी। अगले माह तक सुरक्षा बलों की हर उस इलाके तक पहुंच होगी, जो नक्सल प्रभावित रहे हैं। उन इलाकों में केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों को आपसी तालमेल से आगे बढ़ना होगा। बतौर पीएम नायर, वहां पर पहली चुनौती, बेरोजगारी से पार पाना होगा। लोकल युवाओं को उनकी योग्यता के मुताबिक नौकरी देनी होगी। खास बात है कि यह रोजगार, सरकार को उनके घर पर ही मुहैया कराना है।
युवाओं को दोबारा से विरोध का रास्ता न अपनाना पड़े, इसके लिए सरकार को विशेष बजट का प्रावधान करना चाहिए। सभी केंद्रीय एजेंसियों को एक साथ मिलकर काम करना होगा। उन इलाकों में 'सुरक्षा-केंद्रित विकास' पर फोकस करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि अब वहां पर शांति है तो सुरक्षा बलों को वापस बुला लें। लगभग ढाई दशक पहले जिस तरह से झारखंड के सारंडा के जंगलों में 'सुरक्षा-केंद्रित विकास' की योजना लागू की गई, वैसा ही काम अब करना होगा। लोकल लोगों को प्रोजेक्ट दिए जाएं। पूर्व डीजीपी ने कहा, अगर कोई दो करोड़ का प्रोजेक्ट है तो उसे एक ही व्यक्ति को न देकर, पचास-पचास लाख रुपये चार लोगों को दे दिए जाएं। खुफिया नेटवर्क की मौजूदगी में केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं को आगे बढ़ाना होगा।
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पुलिस आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में तेजी लानी पड़ेगी। केके शर्मा, पूर्व आईजी 'कोबरा' (सीआरपीएफ) कहते हैं कि नक्सलवाद के खात्मे के बाद वहां पर सड़कों का विकास बहुत आवश्यक है। पेयजल की आपूर्ति और संचार सुविधाएं, इनका बड़े पैमाने का विकास करना होगा। ये सुविधाएं, पुलिस और आम आदमी, दोनों के लिए समान रूप से हों। इसके बाद उन इलाकों में मेडिकल सुविधाओं की भारी जरुरत है। इस पर काफी खर्च करने की आवश्यकता है। कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां 12 साल से सड़कों का काम बंद है। 31 मार्च के बाद उन इलाकों में ज्यादा फोर्स की जरुरत होगी। वजह, नक्सलियों को दोबारा पनपने से रोकना होगा। 'सुरक्षा संबंधी व्यय' की मदद से विकास की नई योजनाएं प्रारंभ की जाएं।
- 2014 में नक्सल प्रभावित क्षेत्र 126, अब 18
- सर्वाधिक प्रभावित जिले 35 से घटकर 6 रह गए
- मुठभेड़ में मारे जाने वाले सुरक्षा कर्मियों की संख्या में 73 फीसदी कमी
- नक्सली हिंसा में आम लोगों की मौत में 70 फीसदी की कमी
- दस वर्ष में मारे गए 2000 से ज्यादा नक्सली
- अकेले 2025 में लगभग 1300 नक्सलियों का सरेंडर
- 700 से ज्यादा नक्सली गिरफ्तार
2024 से कितनी हिंसा की घटनाएं और कितनी मौतें?
- 2004 से 2014 के बीच हिंसा की 16463 घटनाएं
- 2014 से 2024 के बीच हिंसा की 7744 घटनाएं
- 2004 से 2014 के बीच मारे गए 1851 सुरक्षा कर्मी
- 2014 से 2024 के बीच मारे गए 509 सुरक्षा कर्मी
- 2004 से 2014 के बीच मारे गए नागरिक 4766
- 2014 से 2024 के बीच मारे गए नागरिक 1495
क्या कदम उठाए गए
- 10 साल में नक्सली इलाकों में 576 किलेबंद पुलिस स्टेशन
- 6 साल में 336 नए फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (एफओबी) स्थापित
- एफओबी पर 68 से ज्यादा नाइट लैंडिंग हेलीपैड
- एनआईए ने नक्सलियों की 40 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति जब्त की
- ईडी ने 12 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की है
- विभिन्न राज्यों ने 40 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की है
सुरक्षा पर कितना खर्च?
- 11 वर्ष में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधित व्यय 3331 करोड़ रुपये
- सुरक्षा घेरा मजबूत 'स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम' में 991 करोड़ रुपये मंजूर
- विशेष केंद्रीय सहायता के तहत 3769 करोड़ की राशि
बुनियादी सुविधाओं का विकास-
- सड़क संपर्क: 2014 से 2025 के बीच 17589 किमी निर्माण के लिए 20815 करोड़ रुपये स्वीकृत
- नक्सली इलाकों में 12000 किमी से अधिक सड़कों का निर्माण पूरा
- मोबाइल कनेक्टिविटी के पहले चरण में 4080 करोड़ की लागत
- इसके जरिए 2343 2जी टावर बनाए गए।
- दूसरे चरण में, 2210 करोड़ का निवेश
- 2542 4जी टावर स्वीकृत, 1139 टावर चालू
- नक्सल प्रभावित क्षेत्रों 8527 4जी टावरों को मंजूरी
- आकांक्षी जिला योजना में स्वीकृत 4281 टावरों में से 2556 टावर चालू
- 4जी संतृप्ति योजना में 4246 टावरों में से 2602 चालू
- नक्सल प्रभावित इलाकों में 1007 बैंक शाखाएं
- 937 एटीएम और 37850 बैंकिंग संवाददाता
- नक्सल प्रभावित 90 जिलों में 5899 डाकघर
- हर 5 किमी पर नागरिकों की डाक एवं वित्तीय सेवाओं तक पहुंच
- कौशल विकास योजना के तहत 48 आईटीआई
- 48 जिलों में 61 कौशल विकास केंद्र (एसडीसी) स्थापित
- इसके लिए 495 करोड़ रुपये स्वीकृत
- फिलहाल 46 आईटीआई और 49 एसडीसी संचालित
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