प्रोटेक्टिंग चिल्ड्रन फ्रॉम हीटवेव्स इन यूरोप एंड सेंट्रल एशिया में कई खुलासे किए हैं। इसके लिए 50 से ज्यादा देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। यूनिसेफ (यूरोप और मध्य एशिया) की क्षेत्रीय निदेशक रेजिना डी डोमिनिकिस का कहना है कि ये देश जलवायु संकट की तपिश महसूस कर रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी दुनिया बढ़ते तापमान से त्रस्त है। इसका असर बच्चों पर भी पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) के अनुसार यूरोप और मध्य एशिया का हर दूसरा बच्चा गंभीर लू की चपेट में है। मतलब की इन देशों में करीब 9.2 करोड़ बच्चे बढ़ती गर्मी और लू का सामना करने को मजबूर हैं। वैश्विक स्तर पर करीब 25% बच्चे गंभीर लू के साये में हैं।
यूनिसेफ की जारी रिपोर्ट बीट द हीट
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प्रोटेक्टिंग चिल्ड्रन फ्रॉम हीटवेव्स इन यूरोप एंड सेंट्रल एशिया में कई खुलासे किए हैं। इसके लिए 50 से ज्यादा देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। यूनिसेफ (यूरोप और मध्य एशिया) की क्षेत्रीय निदेशक रेजिना डी डोमिनिकिस का कहना है कि ये देश जलवायु संकट की तपिश महसूस कर रहे हैं। इस वजह से बच्चों के स्वास्थ्य को सबसे अधिक नुकसान हो रहा है। क्षेत्र में अभी आधे बच्चे गंभीर लू के संपर्क में है, जो 2050 तक सभी बच्चे इसकी चपेट में होंगे।
बढ़ती गर्मी को ऐसे दे सकते हैं मात
प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ी सेवाओं में निवेश करना होगा।
राष्ट्रीय पूर्व चेतावनी प्रणालियों, स्थानीय पर्यावरण के आकलन के लिए संसाधन आवंटित करना और आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए पहल का समर्थन करना होगा।
पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, सामाजिक सुरक्षा और बाल संरक्षण जैसी आवश्यक सेवाओं को अपनाना।
बच्चों और उनके परिवारों को लू के प्रभावों से बचाने वाले उपायों को लागू करने के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था करना।
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण सम्बन्धी कौशल में प्रशिक्षण देकर बच्चों और युवाओं को सशक्त बनाना।