राज्यसभा ने गुरुवार को सूचना का अधिकार कानून में संशोधन संबंधी एक विधायक को मंजूरी दे दी। इस विधेयक को सोमवार को लोकसभा ने अनुमति दे दी थी। इस विधेयक को लेकर विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया था कि इस संशोधन के जरिए सरकार आरटीआई कानून को कमजोर करना चाहती है। सरकार ने विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि केंद्र सरकार पारदर्शिता, जनभागीदारी और सरलीकरण के प्रति प्रतिबद्ध है।
प्रस्ताव पर मतदान के दौरान भाजपा के सीएम रमेश को कुछ सदस्यों को मतदान की पर्ची देते हुए देखा गया। कांग्रेस समेत विपक्ष के कई सदस्यों ने इस पर विरोध दर्ज कराया। विपक्ष के कई सदस्य इसका विरोध करते हुए आसन के सामने आ गए।
बाद में विपक्षी नेता गुलाम नबी आजाद ने इस घटना का जिक्र करते हुए कहा कि आज पूरे सदन ने देख लिया भाजपा ने चुनाव में 303 सीटें कैसे पाई थीं। उन्होंने कहा कि सरकार संसद को किसी सरकारी विभाग की तरह चलाना चाहती है। उन्होंने इसके विरोध में विपक्षी दलों के सदस्यों के साथ वॉक आउट की घोषणा की। विपक्ष के अधिकतर सदस्य सदन से चले गए।
वहीं, विपक्ष के इस आरोप पर भाजपा सांसद सीएम रमेश ने कहा, 'उनके पास संख्या बल नहीं है, उन्हें पता था कि वह हारने वाले हैं, इसीलिए वह मेरे ऊपर आरोप लगा रहे हैं।'
विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए कार्मिक एवं प्रशिक्षण राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि आरटीआई कानून बनाने का श्रेय भले ही कांग्रेस अपनी सरकार को दे रही है किंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के शासनकाल में सूचना के अधिकार की अवधारणा सामने आई थी। उन्होंने कहा कि कोई कानून और उसके पीछे की अवधारणा एक सतत प्रक्रिया है जिसे सरकारें समय-समय पर जरूरत के अनुरूप संशोधित करती रहती हैं।
जितेंद्र सिंह ने कहा कि उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि मोदी सरकार के शासन काल में आरटीआई संबंधित कोई पोर्टल जारी किया गया था। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के शासनकाल में एक एप जारी किया गया है। इसकी मदद से कोई रात के 12 बजे के बाद भी सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है। इस विधेयक में प्रावधान किया गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते और सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें केंद्र सरकार द्वारा तय किए जाएंगे।
उन्होंने विपक्ष के इस आरोप को आधारहीन बताया कि नरेंद्र मोदी सरकार के शासनकाल में अधिकतर विधेयकों को संसद की स्थायी या प्रवर समिति में भेजे बिना ही पारित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यूपीए के पहले शासनकाल में पारित कुल 180 विधेयकों में से 124 को तथा दूसरे शासनकाल में 179 में 125 को स्थायी या प्रवर समिति में नहीं भेजा गया था।
सिंह ने मोदी सरकार के शासनकाल में केंद्रीय सूचना आयुक्त और अन्य आयुक्तों के पद लंबे समय तक भरे नहीं जाने के विपक्ष के आरोपों पर कहा कि इन पदों को भरने की एक लंबी प्रक्रिया होती है। पूर्व में भी कई बार यह पद लंबे समय तक खाली रहे हैं। उन्होंने ध्यान दिलाया कि मुख्य सूचना आयुक्त की चयन समिति की तीन बार बैठक इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि लोकसभा में तत्कालीन विपक्ष के सबसे बड़े दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे बैठक में नहीं आए।
सिंह ने कहा कि आरटीआई अधिनियम में पहले ही केंद्र को नियम बनाने का अधिकार दिया गया है, आज भी वही व्यवस्था है। विधेयक के उद्देश्यों और कारणों में कहा गया है कि आरटीआई अधिनियम की धारा-13 में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की पदावधि और सेवा शर्तों का उपबंध किया गया है। इसमें कहा गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का वेतन, भत्ते और शर्ते क्रमश: मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों के समान होंगी।
इसमें यह भी उपबंध किया गया है कि राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों का वेतन क्रमश: निर्वाचन आयुक्त और मुख्य सचिव के समान होगा। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों के वेतन और भत्ते और सेवा शर्तें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समतुल्य हैं। वहीं केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोग, सूचना अधिकार अधिनियम 2005 के उपबंधों के अधीन स्थापित कानूनी निकाय है। ऐसे में इनकी सेवा शर्तों को सुव्यवस्थित करने की जरूरत है।