संदीप कुमार के लिए अपने ख्वाबों को पूरा करना रेगिस्तान में पानी ढू्ंढ़ने जैसा
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एक रिक्शा चालक के बेटे संदीप कुमार के लिए अपने ख्वाबों को पूरा करना रेगिस्तान में पानी ढू्ंढ़ने जैसा था। संदीप कुमार पश्चिमी दिल्ली कठपुतली कॉलोनी से हटाए गए स्लम के लोगों के लिए बने एक कैम्प में अपने परिवार के साथ रहते हैं। संदीप कुमार के पिता रिक्शा चलाकर घर वालों का पेट भरते थे। पर पिता की मौत ने संदीप को अंदर तक झकझोर दिया और उनके अंदर सिर्विल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल करने और अपने परिवार के लिए बेहतर भविष्य सुरक्षित करने की एक अलख जगाई।
संदीप कुमार बताते हैं कि मेरा ख्वाब हमेशा से एक सरकारी अधिकारी बनना चाहता था। खुद मेरा मानना है कि पिछड़ी जातियों को अखिल भारतीय सेवाओं में और ज्यादा जगह बनाने की जरूरत है। अगर ऐसा संभव होता है तो देश में भी जातिगत भावनाओं से ऊपर उठकर नीतियां बनाई जा सकेंगी।
संदीप के पास कोचिंग करने की सुविधा नहीं थी। 10×12 फीट के केबिन में ही उन्होंने परीक्षा के लिए पढ़ाई की। वो मोती नगर में बतौर अकाउंटेंट काम करते थे जहां उन्हें 5,000 रुपए तनख्वाह मिलती थी। नौकरी का समय खत्म होने के बाद वो अपने ख्वाबों को पूरा करने में लग जाते और पढ़ाई करते। पर इस दौरान भी पूरी तरह से अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रहे थे। बाद में परीक्षा पर पूरा ध्यान देने के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ अपनी तैयारी करने का फैसला किया।
संदीप के बताया कि 'काम और पढ़ाई एक साथ कर पाना बहुत मुश्किल हो रहा था। मेरे पिता की मौत के बाद, मुझे और मेरे भाई को ही अपने घर का खर्च चलाना था। हम लोगों को अपनी मां का सहारा बनना था, जो इतनें सालों से हमारा साथ देती आई हैं। इस बीच मेरे भाई एक एमएनसी में काम करता ने मेरा हौसला और बढ़ाने के लिए मुझसे नौकरी छोड़कर पढ़ाई करने के लिए कहा।
संदीप कुमार की सफलता ने उनके आस-पास रहने वालों को बहुत ज्यादा प्रभावित किया है, जहां वो रहते हैं उसमें अधिकतकर शरणार्थी श्रमिकों के बच्चे हैं। संदीप बताते हैं कि मैं भारतीय पुलिस सेवा ज्वाइन करूंगा, इसको लेकर मैं बेहद खुश हूं।