आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के पूर्व प्राचार्य संदीप घोष को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद पश्चिम बंगाल में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने शनिवार को कहा कि जमानत मिलने का मतलब यह नहीं है कि संदीप घोष निर्दोष हैं। उन्होंने कहा कि कानून भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि कानूनी प्रावधानों के अनुसार चलता है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अस्पताल में कथित वित्तीय अनियमितताओं और अयोग्य उम्मीदवारों को लाभ पहुंचाने के लिए मेरिट अंकों में हेरफेर से जुड़े मामले में घोष को जमानत दी थी। अगस्त 2024 में अस्पताल में एक प्रशिक्षु महिला डॉक्टर के दुष्कर्म और हत्या की घटना के बाद संदीप घोष का नाम भी व्यापक चर्चा में आया था।
'जमानत मिलने से बेगुनाही साबित नहीं होती'
समिक भट्टाचार्य ने कहा कि 'अभया' आंदोलन से जुड़े लोगों में जमानत के फैसले से निराशा हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति को जमानत मिलना उसका कानूनी अधिकार है। उन्होंने कहा कि केवल जमानत मिलने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित व्यक्ति निर्दोष है या उसका कथित अपराध से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जमानत के फैसले में कानूनी और तकनीकी पहलुओं की भूमिका हो सकती है।
'जरूरत पड़ी तो फिर शुरू करूंगा आंदोलन'
वहीं पीड़िता के पिता शेखर देबनाथ ने शनिवार को मीडिया से बातचीत में कहा कि वह इस मामले को उसके अंतिम अंजाम तक ले जाएंगे। उन्होंने कहा "मैं इसे अंत तक लेकर जाऊंगा। अगर जरूरत पड़ी तो इस मुद्दे पर राज्य में नए सिरे से आंदोलन का आह्वान करूंगा और सड़कों पर उतरूंगा।" उनसे पूछा गया कि क्या नए सिरे से आंदोलन मौजूदा भाजपा नेतृत्व वाली राज्य सरकार के खिलाफ विरोध का रूप ले सकता है, क्योंकि उनकी पत्नी रत्ना देबनाथ सत्तारूढ़ दल की विधायक हैं।
इस पर उन्होंने कहा कि राजनीतिक परिस्थितियां बेटी को न्याय दिलाने की उनकी मांग के आड़े नहीं आएंगी। उन्होंने कहा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह सत्तारूढ़ दल का हिस्सा हैं। मैं न्याय के लिए जो भी जरूरी होगा, वह करूंगा।
सुप्रीम कोर्ट ने किन आधारों पर दी राहत?
सुप्रीम कोर्ट ने संदीप घोष को राहत देते समय हिरासत में बिताई गई लगभग दो साल की अवधि और मुकदमे की धीमी प्रगति पर ध्यान दिया। इससे पहले विशेष सीबीआई अदालत ने उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। इसके बाद कलकत्ता हाईकोर्ट से भी उन्हें राहत नहीं मिली थी। दुष्कर्म और हत्या के मामले में दिसंबर 2024 में सियालदह अदालत ने घोष को जमानत दे दी थी। उस समय सीबीआई निर्धारित 90 दिनों की अवधि के भीतर आरोपपत्र दाखिल नहीं कर पाई थी। हालांकि, वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले में वह हिरासत में बने रहे।
वित्तीय अनियमितताओं के मामले में अभियोजन की मंजूरी
पश्चिम बंगाल सरकार ने इस साल 18 मई को भ्रष्टाचार के मामले में संदीप घोष के खिलाफ अभियोजन चलाने की मंजूरी दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत के बाद इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया पर नजर रहेगी।