कोरोना संक्रमण के शुरुआती सात दिन में रैपिड किट्स के जरिए शत प्रतिशत परिणाम नहीं मिल सकते हैं। इन किट्स का इस्तेमाल कोरोना संक्रमण के लक्षण मिलने के 10 से 15 दिन बाद करने पर ही परिणाम मिलते हैं।
वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन के जरिए इसे साबित करते हुए आरटी पीसीआर से अधिक रैपिड जांच पर राज्यों का भरोसा गलत बताया है। पुणे स्थित भारतीय विद्यापीठ के शोद्यार्थियों ने 180 कोरोना संक्रमित मरीजों पर यह अध्ययन किया है जिसे इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित किया गया।
अध्ययन में विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला है कि सबसे संवेदनशील रैपिड जांच के जरिए आणविक (मॉलीक्युलर) निदान को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता लेकिन इसे एक विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है।
जैसे सीरो सर्वे के दौरान इन जांच का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन चिकित्सीय तौर पर इनके जरिए मरीज में संक्रमण की पहचान कर पाना काफी मुश्किल है।
हर किट के नतीजे अलग-अलग
अध्ययन के दौरान प्लाक रिडक्शन न्यूट्रलाइजेशन टेस्ट करने पर 125 लोग संक्रमित मिले। जबकि, पिछले साल आईसीएमआर के सहयोग से तैयार कवच किट के जरिए 56 फीसदी पॉजिटिव परिणाम मिले।
अध्ययन में चार-पांच किट्स का इस्तेमाल करते हुए उनके बीच अंतर निकाला गया। पहले सप्ताह के दौरान एक किट के जरिए केवल 47.4 फीसदी में संक्रमण मिला। जबकि दूसरे सप्ताह में 83.20 फीसदी में दूसरी किट ने संक्रमण की जानकारी दी।
इनके अलावा यूरोइमुन किट के जरिए परिणाम 64 फीसदी, एर्बलिसा नामक किट के जरिए परिणाम 57.6 फीसदी और कवच के जरिए 56 फीसदी ही परिणाम मिला।
42.33 करोड़ में से सिर्फ आधी जांच आरटीपीसीआर से
यह अध्ययन उस वक्त सामने आया है जब देश के अधिकांश राज्यों में रैपिड जांच के जरिए ही कोरोना संक्रमण की पुष्टि की जा रही है। बिहार और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में इन किट्स का काफी इस्तेमाल किया जा रहा है। स्थिति यह है कि देश में अब तक 42.33 करोड़ सैंपल की जांच हो चुकी है जिनमें से आरटी पीसीआर के जरिए केवल 20 करोड़ सैंपल की जांच हुई है।