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बैंकर भी बनेंगे और बैंक का पैसा भी लेंगे, वाह! भाई वाह

Tue, 24 Nov 2020 10:54 PM IST
गौरव पाण्डेय शशिधर पाठक, नई दिल्ली

सार

  • पूर्व बैकिंग सचिव ने कहा कमेटी बनाने की ही जरूरत नहीं थी
  • ऐसा हुआ तो पता ही नहीं चलेगा कि पैसा कहां से आया और कहां गया
  • दुनिया में जो कहीं नहीं है, वैसे प्रयोग पर आखिर चर्चा ही क्यों?
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भारतीय अर्थव्यवस्था
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विस्तार
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रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और केंद्रीय बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य का विरोध जायज है। इस तरह का विचार ही देश की अर्थव्यवस्था और बैंकिंग प्रणाली के लिए बहुत घातक है। बैंकिंग मामलों के पूर्व सचिव डीके मित्तल को अर्थशास्त्र की गहरी समझ है। डीके मित्तल कहते हैं कि आखिर यह कोई बात हुई कि आप बैंकर भी बनोगे और देश की बैंकों से पैसा लेकर अपना कारोबार भी करोगे। आखिर यह दोनों विरोधाभास कैसे चल सकता है? जरा मुझे कोई बताए कि दुनिया के किस देश में ऐसा चलन है। 

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डीके मित्तल का कहना है कि केंद्रीय बैंक के पैनल द्वारा किया गया यह प्रस्ताव देश के लिए घातक साबित होगा। हालांकि उनका कहना है कि यह दबाव में लाया गया प्रस्ताव है और यह अमल में नहीं आएगा। संसदीय समिति भी इसे पहले ही खारिज कर चुकी है। मित्तल कहते हैं कि जहां तक मैं समझता हूं, केंद्र सरकार इसे अपनी मंजूरी नहीं देगी। लेकिन इस तरह का प्रस्ताव आना ही ठीक नहीं है।


कमेटी की जरूरत क्या थी? कारोबारी घरानों के दबाव में आया है प्रस्ताव
डीके मित्तल का कहना है कि केंद्रीय बैंक के इंटरनल वर्किंग ग्रुप (आईडब्ल्यूजी) के गठन की अभी जरूरत ही क्या थी? पूर्व आईएएस अधिकारी का कहना है कि यह प्रस्ताव मेरी समझ से बाहर है। उन्होंने कहा कि जहां तक मेरा मत है, यह प्रस्ताव बड़े कारोबारियों के दबाव में आया है। कुछ बड़े बिजनेस हाउस बैंकर बनना चाहते हैं। हालांकि उनकी इच्छा बैंकर बनने के साथ-साथ बैंक से पैसे लेकर कारोबार करने की है। मेरा सुझाव है कि आखिर वह बैंक से पैसा लेकर कारोबार करते हैं तो बैंकर क्यों बनना चाहते हैं। यदि वह देश की अर्थव्यवस्था में सकारात्मक योगदान देना चाहते हैं तो उन्हें चाहिए दूसरे वित्तीय संस्थान खोलने की तरफ कदम बढ़ाएं। बीमा कंपनियों की स्थापना करें। देश की ठोस बैंकिंग प्रणाली को कमजोर करने की इतनी प्रबल इच्छा उनमें क्यों जाग रही है?
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बड़ी समस्या: पता ही नहीं चलेगा कि पैसा गया कहां?
डीके मित्तल का कहना है कि इस तरह का प्रस्ताव अमल में आने के बाद पैसे के आवागमन में बहुत बड़ा झोल पैदा हो जाएगा। आज तक हम पीएमसी के पैसे का पता नहीं लगा पाए? यही होने वाला है। पता ही नहीं चलेगा कि पैसा कहां से आया और कहां गायब हो गया? दुनिया के देशों में यही चलन है। कारोबारी बैंक से पैसा लेकर कारोबार करता है और बैंक अपनी बैंकिंग। इन दोनों के बीच में आपसी विरोधाभास या असमंजस की स्थिति नहीं पैदा की जाती। मैं इस तरह के प्रयास के पूरी तरह से खिलाफ हूं। 

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