दुनियाभर में बच्चों को महामारी से बचाने के लिए शुरू हुए ऑनलाइन स्कूल अब स्थायी बनने जा रहे हैं। हाल में हुए कुछ अध्ययनों की मानें तो बड़े पैमाने पर बच्चों, परिवारों और स्कूलों को ऑनलाइन शिक्षा रास आने लगी है।
भले ही बच्चों के शैक्षणिक भावनात्मक विकास पर असर पड़ा हो, लेकिन इसे बदलते वक्त की जरूरत मान लिया गया है। यही वजह है कि प्रशासन और अनेक शिक्षण संस्थान घर बैठे पढ़ाई की सुविधा मुहैया कराने में नहीं हिचक रहे और ये भविष्य की योजना पर काम कर रहे हैं। दुनियाभर में रिमोट लर्निंग की मांग तेजी से बढ़ी है।
अभिभावक-शिक्षकों ने दी तवज्जो
दुनियाभर में ऐसे छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों की संख्या बढ़ी है, जो रिमोट लर्निंग को प्राथमिकता दे रहे हैं। कई बच्चे स्वास्थ्य कारणों तो कुछ बच्चे स्कूलों में भेदभाव-हिंसा के चलते घर पर ही पढ़ना चाहते हैं। शोधकर्ताओं ने कहा, अमेरिका में 13 हजार जिला स्कूलों में से सैकड़ों ने सालभर में अलग वर्चुअल स्कूल बनाए हैं। इन ‘स्टैंड अलोन’ स्कूलों के अलग शिक्षक हैं, जो अलग पाठ्यक्रम के आधार पर पढ़ा रहे हैं।
अमेरिका में 20 फीसदी जिला प्रशासक रखेंगे जारी
रेड कॉर्पोरेशन के अध्ययन के मुताबिक, कोरोनाकाल के बाद कई देशों में ‘रिमोट लर्निंग’ जारी रहेगी। अमेरिका में ही 288 जिला प्रशासकों में से 58 यानी 20 फीसदी ने कहा, उनके यहां महामारी से पहले ही ऑनलाइन पढ़ाई कराई जाने लगी थी और अब इसे आगे भी जारी रखा जाएगा।
स्कूल जाना नहीं था पसंद
ब्लूमंगटन में रहने वाले छठी कक्षा के छात्र रोरी लेविन को स्वास्थ्य कारणों से स्कूल जाना पसंद नहीं था। उसकी मां लीसा बताती है कि रोरी ऑनलाइन पढ़ाई में रुचि दिखाता है।
नुकसान भी: सीखने की क्षमता पर पड़ रहा है असर
कुछ अभिभावकों ने रिमोट लर्निंग को चिंताजनक बताते हुए परंपरागत स्कूलों की पैरवी की है।
नुकसान भी- सीखने की क्षमता पर पड़ रहा असर
कुछ अभिभावकों ने रिमोट लर्निंग को चिंताजनक बताते हुए परंपरागत स्कूलों की पैरवी की है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, सालभर में बच्चे के सीखने की क्षमता और तरीकों पर असर पड़ा है। इस पद्धति से श्वेत व अश्वेत और एशियाई परिवारों के बीच खाई पैदा हो गई है। वहीं, अध्ययनों में सामने आया है कि फुल टाइम ऑनलाइन स्कूलों से पढ़ रहे बच्चों का प्रदर्शन परंपरागत स्कूलों से खराब रहा है।