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गणतंत्र विशेष: संविधान की रोचक बातें, कुछ नए सवालों के साथ

Thu, 26 Jan 2017 12:09 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला
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26 नवंबर 1949 को हमारा संविधान, संविधान सभा में पारित हुआ था। इसके ठीक दो महीने बाद 26 जनवरी 1950 को हमारा
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संविधान लागू हुआ था, इससे पहले अंग्रेजों द्वारा बनाया हुआ संविधान ही देश भर में लागू था।

इस संविधान को बनाने में 2 वर्ष 11महीने 18 दिन लगे थे। भारतीय संविधान को विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान कहा जाता है। हालांकि बड़ा और लिखित संविधान होने के बावजूद इसमें संशोधन की गुंजाइश हमेशा रही है और समय-समय पर ऐसे संशोधन होते भी रहे हैं। 

आकलन करें, तो अब तक 110 से भी अधिक संविधान संशोधन हो चुके हैं। हमारा संविधान इतना लचीला है कि इसमें पहला संशोधन
इसके लागू होने के एक साल बाद ही 1951 में हो गया था और यह सिलसिला संविधान बनने के इतने साल बाद आज भी जारी है।

वैसे तो हर देश का संविधान अपने देश की जनता की भलाई के लिए होता है, लेकिन मुझे लगता है कि भारत का संविधान दुनिया का
अकेला ऐसा संविधान है, जो जनता की नहीं बल्कि नेताओं, वकीलों, नौकरशाहों के अलावा पूंजीपतियों की भलाई के लिए है। 
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इसी संविधान में आरक्षण को 10 वर्षों के लिए लागू किया गया था, लेकिन यह देश की तुच्छ और वोट बैंक की राजनीति के कारण
आज तक चला आ रहा है। इसका उद्देश्य क्या था? इससे किसी को कोई मतलब नहीं है?

इसका सबसे अधिक खामियाजा आज देशका सवर्ण समाज भुगत रहा है। इनमें भी सभी नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर लोग इसका शिकार हो रहे हैं।

मैं आरक्षण काविरोधी नहीं हूं, बल्कि इसको लागू करने के तरीके का विरोध करता हूं। आरक्षण को आर्थिक आधार पर लागू करना चाहिए था, लेकिनऐसा नहीं किया गया। 

क्या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों में ही लोग गरीब हैं? क्या सामान्य वर्ग में कोई गरीब नहीं है? इस पर विचार करने
की किसी भी पार्टी ने आज तक जरूरत नहीं समझी।

आश्चर्य की बात तो यह है कि इस देश में गरीबी हमेशा एक मुद्दा रही है, लेकिन यह मुद्दा भी चुनाव के समय ही नजर आता है और चुनाव संपन्न होने के साथ ही चला जाता है।

इस पर कितने ही चुनाव पार्टियों द्वारा लड़ लिए गए, लेकिन गरीबों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया और न ही गरीबी हटी। आखिर क्यों? शायद इस बारे में हम गंभीरता से सोचना नहीं चाहते? 
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सही मायने में देश को गणतंत्र तभी कहा जा सकता है, जब सभी को समान अधिकार मिलें, अन्यथा इसे मनाने का कोई औचित्य नहीं
है। वैसे भी पिछले कई सालों से हम इस दिवस को मनाते चले आ रहे हैं। हर साल पुरानी बातें दोहराई जाती हैं।

गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस अच्छे भाषण  जरूर सुनने को मिलते हैं, लेकिन हकीकत में क्या होता है, यह हम सभी अच्छी तरह जानते हैं।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि गणतंत्र का वास्तविक स्वरूप तभी नजर आएगा, जब देश में सभी लोगों को समान अधिकार मिल। तभी इसे सफल लोकतंत्र कहा जा सकता है।

अन्यथा हम इसी प्रकार भारतीय लोकतंत्र को दुनिया के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र की दुहाई देते रहेंगे, जिसका कोई औचित्य नजर नहीं आता है।
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