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जानिए क्या है लव जिहाद, जिसने बर्बाद कर दी अनेक महिलाओं की जिंदगी

Sat, 20 Jan 2018 07:35 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
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लव जिहाद, नाम तो सुना ही होगा। हां वही शब्द जिसे पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दे दी थी। वही शब्द जिसके नाम पर हदिया को उसके पति से दूर रखा जा रहा है। वही शब्द जिसकी दलील देकर एक हिंदू महिला को अपने प्रेम संबंध किसी गैर धर्म के व्यक्ति के साथ बनाने की इजाजत नहीं दी जाती। हां-हां वही शब्द, जिसकी आड़ में कुछ हिन्दू श्रेष्ठतावादी लोग साम्प्रदायिकता की आग को भड़काना और महिलाओं का वस्तुकरण कर रहे हैं। आज हम अपनी गणतंत्र दिवस की 69वीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं, लेकिन महिलाओं को आज भी अपनी आजादी की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। 

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लव जिहाद, नाम तो सुना ही होगा आपने। अबतक आप कभी-कभार देश में लव जिहाद के किस्से सुनते आए होंगे लेकिन जब से इस शब्द को सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दे दी है तब से इस शब्द का इस्तेमाल पुरजोर तरीके से हो रहा है। लव जिहाद दो शब्दों से मिलकर बना है। अंग्रेजी भाषा का शब्द लव यानी प्यार, मोहब्बत, इश्क और अरबी भाषा का शब्द जिहाद। जिसका मतलब होता है किसी मकसद को पूरा करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देना। यानी जब एक धर्म विशेष को मानने वाले दूसरे धर्म की लड़कियों को अपने प्यार के जाल में फंसाकर उस लड़की का धर्म परिवर्तन करवा देते हैं तो इस पूरी प्रक्रिया को लव जिहाद कहा जाता है।

लव जिहाद शब्द हिन्दू श्रेष्ठतावादियों की देन है, जिनका यह आरोप है कि मुसलमान पुरूष, हिन्दू स्त्रियों को अपने प्रेम जाल में फंसाकर उनसे विवाह करते हैं और फिर उन्हें मुसलमान बना लेते हैं। मुसलमानों को बदनाम करने और उनके दानवीकरण का सुनियोजित अभियान लंबे समय से जारी है। किसी भी समुदाय को इस प्रकार निशाना बनाया जाना घोर निंदनीय है परंतु इसके साथ-साथ, हमें इस प्रश्न पर भी विचार करना होगा कि इस तरह के अभियानों का महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव पड़ता है। 

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महिलाओं के अधिकारों की अनदेखी

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। भारतीय संविधान अपने सभी वयस्क नागरिकों को अपने पसंद के धर्म को मानने का अधिकार प्रदान करता है। यहां धर्म परिवर्तन के साथ या इसके बिना भी अंतरजातीय विवाह को मान्यता दी गई है। एक-दूसरे की सहमति से दो वयस्कों के अनुबंधित विवाह को एक पक्ष या दोनों की सहमति से ही समाप्त किया जा सकता है, किसी तीसरे पक्ष की आपत्ति पर नहीं। इसके बावजूद इस मूलभूत अधिकार को इस विवाद में अक्सर नकार दिया जाता है।

हिन्दू श्रेष्ठतावादियों का मुसलमानों के खिलाफ यह अभियान महिलाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों को लोगों के दिमाग से गायब करने लग जाते हैं। इनमें शामिल हैं खाप पंचायतों द्वारा प्रायोजित और प्रेरित ऑनर किलिंग, सार्वजनिक स्थानों पर पुरूषों के साथ देखे जाने पर महिलाओं की पिटाई और उन्हें केवल बच्चे पैदा करने की मशीन के रूप में देखा जाना, जिनका एकमात्र कार्य राष्ट्र की खातिर अमुक संख्या में बच्चे पैदा करना है।

वैसे लव जिहाद शब्द का ईजाद केरल की धरती पर हुआ है। पहली बार इसका इस्तेमाल भी ईसाई समूहों ने किया था जो मुस्लिम युवकों से शादी करने के लिए इच्छुक ईसाई युवतियों के बढ़ते मामलों से चिंतित थे। हाल के दौर में भाजपा-आरएसएस के कुछ नेता और हिंदू समूह चुनाव के समय हिंदू मतों को लामबंद करने के लिए लव जिहाद को सियासी हथियार के तौर पर भी इस्तेमाल करते रहे हैं। 

इस विवाद की उपज केरल राज्य में हुई जहां 2016 के विधानसभा चुनाव में दक्षिणपंथी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी जमीन मजबूत बनाने में लगी थी। इस राज्य में मुस्लिमों की अच्छी आबादी है। यह उन कुछ राज्यों में से है जहां मुसलमानों की एक राजनीतिक पहचान अब भी बरकरार है। 

कोर्ट का भी महिलाओं के प्रति रुख नरम नहीं

यह आश्चर्यजनक है कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे को लैंगिक मतभेद के रूप में और विवाह से जुड़े महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की अनदेखी को देखने में विफल रहा। हदिया के केस में उसे कोर्ट में "कमजोर और प्रभावित किए जाने योग्य" बताया गया और उसे उसके मां-बाप के हवाले कर दिया गया। लेकिन बाद में हदिया ने मजबूती से अपना पक्ष रखने की कोशिश की उन्होंने साफ लहजे में कहा कि वो आजादी चाहती हैं, वो अपने धर्म में बनी रहना चाहती हैं और पढ़ाई पूरी करना चाहती हैं। 

आपको बता दें, हदिया 24 साल की हदिया का जन्म हिंदू परिवार में हुआ और शादी के बाद जनवरी 2016 में उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया और अपना नाम अखिला से बदल कर हदिया रख लिया। तब से उनके पिता यह साबित करने के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं कि हदिया का धर्म परिवर्तन उनकी अपनी इच्छा से नहीं बल्कि "बहला-फुसला" कर किया गया है।  
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राजनीति का हिट फॉर्मूला है लव जिहाद

ऐसे में, जहां एक तरफ तीन तलाक के विवाद के दौरान मीडिया इस तथ्य पर दुखी हो रहा था कि एक मुस्लिम महिला को उसके अधिकार से वंचित रखा जाता है और वो कथित तौर पर पुरुषप्रधान मुस्लिमों की सताई हैं। वहीं इस मामले में एक मुस्लिम महिला के अधिकारों की अनदेखी कहां तक जायज है ? 

अगर समाज के ठेकेदारों की मानें तो इस मामले को यूं भी देखा जा सकता है कि हादिया एक हिंदू महिला पीड़ित है जिसका आसानी से ब्रेनवाश किया गया और फिर उससे इस्लाम कबूल करवाया गया। 
हिंदू महिलाओं का मुस्लिम पुरुष से शादी करना "लव जिहाद" बताना यह दर्शाता है कि हिंदू महिलाएं बुद्धिमान विकल्प नहीं चुनतीं। इसके अलावा, चूंकि महिलाएं उनके लिए क्या अच्छा है - यह तय करने में सक्षम नहीं है, इसलिए उनके पिता को उनके फैसले करने चाहिए और बिना पिता की सहमति के शादी मान्य नहीं होनी चाहिए।

इस शब्द का कुछ राजनीतिक पार्टियां हौआ बनाकर बखूबी इस्तेमाल कर रही हैं। लेकिन इस विवाद में परेशान करने वाली बात यह है कि हमारे न्यायालय भी दक्षिणपंथी हिंदुओं की इस शब्दावली का समर्थन करते नजर आते हैं। लेकिन हमें यह समझने की जरुरत है कि हर व्यक्ति को अपनी पसंद के साथी को चुनने का अधिकार है और उसके अधिकारों का यह हनन उसकी आजादी को छिनने जैसा है।
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