कश्मीरी पंडितों का तीन स्तर पर जनसंहार हुआ। पहले स्तर पर डायरेक्ट किलिंग यानी मार-काट हुई। सांस्कृतिक और आर्थिक तौर पर भी उन्हें मारा गया। पंडितों को जड़ों से अलग और परंपराओं से बेदखल किया गया। अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई में एक नहीं, दो-दो पीढ़ियां चली गईं। निर्वासन के भीतर एक और निर्वासन हो गया। शिक्षा और नौकरी के लिए बच्चे मां-बाप से अलग हो गए। ये पीढ़ी पूरी तरह जड़ों से कटकर बंजारा बन गई। - डॉ. अग्निशेखर पनुन कश्मीर के अध्यक्ष एवं साहित्यकार
1984 के सिख दंगों के केस दोबारा खुल सकते हैं तो 1990 में कश्मीरी पंडितों पर जुल्म के केस क्यों नहीं खुल सकते? अनुच्छेद 370 हटाने से पहले जो कदम उठाए गए, ऐसे कदम 1990 में उठाए होते तो कश्मीरी पलायन करने को मजबूर नहीं होते। बड़ा सवाल यह है कि कश्मीरी पंडितों का कसूर क्या है? घाटी में पंडितों को बेरहमी से मारने वाले सार्वजनिक तौर पर अपना जुर्म कुबूल चुके हैं, पर आजतक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। गृहमंत्री से मुलाकात कर मैंने इस मसले को उठाया था, लेकिन कार्रवाई का इंतजार है। पंडितों के विस्थापन के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या तत्कालीन सरकार और प्रशासन का हाथ था? किसकी शह पर आतंक का नंगा नाच हुआ? इसकी जांच होनी चाहिए। केंद्र सरकार को श्वेतपत्र लाना चाहिए, तब ही इंसाफ मिल पाएगा। - एडवोकेट रविंद्र रैना, अध्यक्ष, ऑल स्टेट कश्मीरी पंडित कॉन्फ्रेंस