जम्मू के भगवतीनगर में रह रहे 74 साल के मक्खन लाल काजी के भाई अशोक काजी को भी जनवरी 1990 में शिवरात्रि के दिन सरेबाजार मार दिया। काजी बताते हैं- उनके 35 साल के भाई को श्रीनगर के बाजार में गोली मारकर आतंकी वहीं दूध पीते रहे। सड़क पर तड़पते भाई की मदद को कोई नहीं आया। दूध पीने के बाद आतंकियों ने देखा कि वो अभी जिंदा है, तो लातें मारने के बाद फिर गोलियां दाग दीं।
लोगों में खौफ का आलम यह था कि छानपुरा स्थित उनके घर पर अफसोस जताने तो दूर भाई के दाह संस्कार के लिए भी कोई नहीं आया। परिवार के सदस्य ही उन्हें श्मशान ले गए। हमले के डर से जल्दी में चिता को आग लगाकर सभी घर वापस आ गए। लेकिन बारिश के चलते चिता बुझ गई। अगले दिन पुलिस के कुछ लोगों को साथ ले जाकर परिवार के लोगों ने ही फिर से उन्हें जलाया।
पिता को हार्ट अटैक आ गया, मां ने बचाईं बेटियां
जगती माइग्रेंट कॉलोनी में रह रहीं 47 साल की अंजलि कार त्रासदी को याद करते ही रोने लगती हैं। मूल रूप से श्रीनगर के हवा कदल की अंजलि बताती हैं- उस समय वह आठवीं में पढ़ती थीं। पांच बेटियों के परिवार में वह सबसे छोटी थीं। सड़कों पर जब ‘बहू-बेटियों को छोड़ कश्मीरी पंडितो भाग जाओ’ के नारे लगे तो पिता की हार्ट अटैक से मौत हो गई।
पांच बेटियों और तीसरी में पढ़ते बेटे को लेकर मां रातों-रात जम्मू आ गईं। सब कुछ वहीं छूट गया। पुरखों का घर-बार छूट गया। जगती कॉलोनी की ही 54 साल की संतोष हाली ने बताया कि सोपोर में उनके पड़ोस में रह रहे एक-एक नौजवान को घर से ले जाकर नदी किनारे गोली मार दी गई। पति को बचाने के लिए पीछे भागी उसकी पत्नी का आज तक पता नहीं चल सका।
घाटी में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाने की शुरुआत 1986 में अनंतनाग से हुई थी। अनंतनाग के लाल चौक पर गोकशी के बाद कुछ पंडितों ने इसका विरोध किया। इसके बाद वहां चार-पांच गांवों में आगजनी की घटनाएं हुईं। इसके बाद हत्याओं और हमले का सिलसिला शुरू हो गया।
डॉक्टर भाई को घर से निकाल कर मार दी गोली
ऑल स्टेट कश्मीरी पंडित कॉन्फ्रेंस के महासचिव डॉ. टीके भट्ट भी उस दौर को याद कर भावुक हो जाते हैं। कहते हैं-मेरा चचेरा भाई डॉक्टर था। कुछ लोग उन्हें यह कहकर घर से ले गए कि मरीज देखना है। घर से ले जाकर सड़क पर उन्हें गोली मार दी गई। दाह-संस्कार के दौरान तीन-चार लोग मोटरसाइकिल पर आए और धमकी दी कि उनके संस्कार में शामिल हुए लोगों को भी नहीं छोड़ेंगे। लोगों में दहशत हो गई। घर आए और परिवार को लेकर उसी रात निकल पड़े। 75 साल की मां भी साथ थी। जवाहर टनल क्रॉस कर देखा तो मां के एक पांव में जूता था और दूसरे में चप्पल। यह देखकर मां के साथ सभी रो पड़े।
मेरे पिता राजेंद्र कुमार मैगजीन बैंक ऑफ इंडिया में थे, मां अनुपमा गृहिणी थीं। 1988 में पिताजी ने अपनी पूरी कमाई लगाकर श्रीनगर के करननगर में 22 कमरे का आलीशान मकान बनवाया था। 1989 में अचानक से हालात खराब हो गए और 30 दिसंबर को हम अपना सबकुछ छोड़कर जम्मू के शरणार्थी कैंप में चार दिन रहे, लेकिन कत्लेआम बढ़ता गया। हम दिल्ली आ गए। एक साल पढ़ाई खराब हो गई। दिसंबर 1990 में फरीदाबाद आ गए।
सोचिए, 22 कमरे के मकान में रहने वाला परिवार दो कमरे में रहने को मजबूर हो गया। हमारे पास कुछ नहीं था। घुट-घुट कर मर रहे थे। 21 अगस्त 1990 को खबर मिली की घर को जला दिया गया है, परिवार पर पहाड़ टूट पड़ा। हम तो ये उम्मीद लगाए थे कि सब ठीक हो जाएगा तो 'हम वापस जाएंगे। 2006 में गया तो लेकिन होटल में रुका। उस रात नींद नहींं आई। बेचैनी उस दिन भी थी, आज भी है। 22 कमरे का मकान मलबे में तब्दील हो गया था, 2015 में गया तो सिर्फ जमीन दिखी।
2007 में श्रीनगर गया था तो शिकारे पर एक बेचने वाले से रेट पूछा, मैंने कश्मीरी में कहा 'अस छी यतकी’ यानी मैं भी यहीं का हूं तो उसने जवाब दिया 'असीव’ यानी थे, अब नहीं हो। दिल बैठ गया पर कुछ कर नहीं सकते क्योंकि हम पर हुए अत्याचार तो सब भूल गए हैं। मैंने अपनी मां के चेहरे पर डर और भय महसूस किया था। वो जब बाहर निकलती थीं तो सुहाग की निशानी नहीं पहनती थीं, बिंदी नहीं लगाती थीं। दहशतगर्द ऐसी किसी महिला को देख लेते थे तो कश्मीरी पंडित-कश्मीरी पंडित कहकर घिनौना काम करते थे, फिर मौत की नींद सुला देते थे। - अमल मैगजीन, फरीदाबाद
19 जनवरी 1990 को पूरे श्रीनगर में कत्लेआम हो रहा था। मस्जिदों से एलान हो रहा था। परिवार में 16 लड़कियां थीं, जिनकी चिंता हमें हर सेकंड मार रही थी। जैसे-तैसे उन्हें एक कार में भरकर जम्मू पहुंचाया। वो मंजर याद कर आज भी हलक सूख जाता है। हम बेबस थे। बदकिस्मती है कि इंसानी शक्ल में भेड़ियों ने जो किया उसकी सजा उन्हें आज तक नहीं मिली।
पिता महाराजकृष्ण रैना सरकारी कर्मचारी थे और मां सीमा रैना गृहिणी थीं। हमारा सबकुछ लुट गया था। औने-पौने कीमत पर साल 2000 में घर बेचकर बहन की शादी की। मां-पिता आज भी घर को याद करते हैं, तो आंखें भर आती हैं। आंसू तो मेरे फूटते हैं, लेकिन छुपा लेता हूं क्योंकि अब मैं ही उनकी हिम्मत हूं, कमजोर पड़ गया तो हम तो पहले से ही टूटे हैं, सब खत्म हो जाएगा। - अमित रैना, वैशाली, गाजियाबाद
12 साल की थी, परिवार के साथ आई पर खुशियां वहीं छूट गईं
मैं बारह साल की थी। इस उम्र में बच्चे पढ़ने खेलने के सिवा कुछ नहीं जानते। लेकिन हालात ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया। नरसंहार का दौर ऐसा था कि मैं जीते जी मर चुकी थी। छोटी उम्र में ही सब सह लिया। श्रीनगर के करननगर में घर था। घर के पास चार मस्जिदें भी थीं। 19 जनवरी 1990 की बात है। अचानक एलान हुआ कि पुरुष महिलाओं व बेटियों को छोड़कर निकल जाएं।
पापा प्यारेलाल राजदान, मां उषा और बड़े भाई आशीष को मेरी और मेरी दो बहनों सुनीता और अनिता की चिंता सता रही थी। तीनों को घर के सबसे ऊपरी मंजिल के स्टोर में रखा गया, जहां सांस लेना मुश्किल था। इंसानी भेडि़ए बार-बार दरवाजा खटखटा रहे थे। रात को ही जान बचाकर हम सब भागे। करीब चार साल तक शरणार्थी कैंप में रहे। 1995 में दिल्ली आए और तब से लेकर अब तक वापसी और इंसाफ के इंतजार में दिन काट रहे हैं। - मोनिका पंडिता, वैशाली सेक्टर-4, गाजियाबाद
मैं तेरह साल का था और सातवीं कक्षा में पढ़ता था। हमारा घर श्रीनगर के रावलपुर में था। बहन सुनैना डेढ़ साल की थी। हम रातों-रात जान बचाकर भागने को मजबूर हुए। घर का हर सदस्य अपनी जान से ज्यादा बहन-बेटियों, बुआ की जान और इज्जत के लिए चिंतित था। माता-पिता और पूरे परिवार के साथ पैदल ही रावलपुर बस स्टैंड के लिए निकले थे, जो घर से 12 किमी. दूर था। भूखे-प्यासे शरणार्थी कैंप पहुंचे तो वहां के हालात देख परिवार फूट पड़ा। शायद जानवरों की तरह जमा भीड़ हमारी नई जिंदगी थी। काफी समय तक कैंप में रहे। इसके बाद दिल्ली आए। उम्मीद हमेशा रही और आज भी है कि घर वापस जाएंगे लेकिन कैसे ये पता नहीं। - राजीव कौल, गाजियाबाद