सुप्रसिद्ध गीत-गजलकार डॉ. कुंवर बेचैन नही रहे। वे हिंदी साहित्य में सार्थक और सुंदर पद्म के लिए जाने जाते रहे। कोमल शब्दों का अदभुत चयन उनकी एक और विशेषता थी। वे अपने समय में समरस रहे। जरूरत पड़ने पर विलग होने का भाव भी दिखता था। उनकी दो पंक्तियां देखिए- जिंदगी यूं भी जली, यूं भी जली मीलों तक, चांदनी चार कदम, धूप चली मीलों तक। वे जीवनघाती कोरोना से संक्रमित हो गए थे।
गाजियाबाद के नेहरूनगर में रहने वाले कुंवर बेचैन कोरोना संक्रमित हो गए थे। तबीयत ज्यादा खराब होने पर उन्हें अस्पताल में वेंटिलेटर बेड नहीं मिल पा रहा था। कवि कुमार विश्वास के ट्वीट के बाद उन्हें कैलाश अस्पताल में वेंटिलेटर मिल पाया था।
मुरादाबाद जिले के ग्राम ऊमरी कलां में एक जुलाई 1942 को जन्मे कुंवर बेचैन का पूरा नाम कुंवर बहादुर सक्सेना था। कुंवर जी को बचपन से ही कविता लिखने का शौक था। इनका प्रारंभिक जीवन विपदाओं और उतार चढ़ाव से भरा रहा। जब ये दो वर्ष के थे तो इनके सिर से माता-पिता का साया उठ गया। उसके बाद इनका पालन पोषण बड़ी बहन ने किया। कुंवर साहब अपने बारे में कहते थे कि दुख ही मेरी प्रेरणा बने और उसी के बीच कुंवर बेचैन निकला। गाजियाबाद के एमएमएच डिग्री कॉलेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे कुंवर बेचैन की गजलों में आम आदमी के दैनिक जीवन का चित्रण मिलता है। उन्होंने अपने गीतों और कविताओं के जरिये लोगों से एक खास रिश्ता बनाया। शब्दों की गहराई के साथ भावनाओं की संगत उनकी कविताओं और गजलों में देखने को मिलती है। उन्होंने समाज के हर दर्द को शब्दों के जरिये अपनी गजलों और कविताओं में पिरोया।
जीवन के संघर्षों को भी उन्होंने शब्दों के जरिए बड़ी खूबसूरती से उकेरा। उन्होंने लिखा -
जिंदगी यूं भी जली यूं भी जली मीलों तक
चांदनी चार कदम धूप चली मीलों तक।
जब बात रुमानियत की आई तो उन्होंने लिखा -
दिल पे मुश्किल है बहुत दिल की कहानी लिखना।
जैसे बहते हुए पानी पे हो पानी लिखना।।
कोई उलझन ही रही होगी जो वो भूल गया।
मेरे हिस्से में कोई शाम सुहानी लिखना।।
फिर उन्होंने लिखा-
मिलना और बिछुड़ना दोनों जीवन की मजबूरी है
उतने ही हम पास रहेंगे जितनी हममें दूरी है।
रचनाएं
कुंवर बेचैन 35 किताबें लिख चुके थे। उनकी प्रमुख रचनाओं में पिन बहुत सारे, भीतर सॉकल : बाहर सॉकल, उर्वशी हो तुम, झुलसो मत मोरपंख, एक दीप चौमुखी, नदी पसीने की, दिन दिवंगत हुए शामिल हैं। इसके अलावा शामियाने कांच के, महावर इंतजार का, रस्सियां पानी की, पत्थर की बांसुरी, दीवारों पर दस्तक, नाव बनता हुआ कागज, आग पर कंदील। नदी तुम रुक क्यों गई, शब्द: एक लालटेन, पांचाली उनके कई कविता संग्रह भी हैं।
सम्मान
कुंवर बेचैन को 1977 में साहित्य सम्मान, 2004 में उप्र हिंदी संस्थान की ओर से साहित्य भूषण, 2004 में ही परिवार पुरस्कार सम्मान, मुंबई से नवाजा गया था। इसके अलावा पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने भी उन्हें सम्मानित किया था।