ठाणे के कल्याण की विशेष फास्ट-ट्रैक अदालत ने 2011 में 15 वर्षीय लड़की से दुष्कर्म और धर्म परविर्तन के मामले में अजहर उर्फ बदू मुश्ताक कुरैशी को 10 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई। अदालत ने माना कि नाबालिग होने के कारण पीड़िता का धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से किया गया कदम नहीं माना जा सकता। हालांकि, अपनी इच्छा से लखनऊ जाने के कारण आरोपी को अपहरण के आरोप से बरी कर दिया गया।
नाबालिग उम्र में धर्म परिवर्तन को कोर्ट ने नहीं माना स्वेच्छा
फैसले में अदालत ने कहा कि आरोपी के साथ जाने के दौरान पीड़िता ने इस्लाम धर्म अपना लिया था। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जब पीड़िता ने इस्लाम धर्म अपनाया और आरोपी के साथ चली गई, उस समय वह नाबालिग थी। इसलिए धर्म परिवर्तन से जुड़ी रस्मों में उसकी भागीदारी को उसकी स्वतंत्र इच्छा से किया गया कदम नहीं माना जा सकता।
अपहरण के आरोप से आरोपी बरी
महाराष्ट्र के ठाणे जिले के डोंबिवली की रहने वाली पीड़िता अपनी इच्छा से आरोपी अजहर उर्फ बदू मुश्ताक कुरैशी (39) के साथ लखनऊ गई थी। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को अपहरण के आरोपों से बरी कर दिया।
अलग नाम से टिकट खरीदना बना आरोपी के खिलाफ अहम सबूत
हालांकि, अदालत ने कहा कि अलग नाम से टिकट खरीदना आरोपी की पहले से सोची-समझी गलत नीयत की ओर इशारा करता है। कोर्ट ने माना कि उपलब्ध सबूतों से यह स्पष्ट होता है कि आरोपी ने पहले से साजिश रची थी और उसका उद्देश्य केवल पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध बनाना था।
18 साल से कम उम्र की लड़की से संबंध बनाना दुष्कर्म की श्रेणी में
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया है कि 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध बनाने वाला व्यक्ति भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत दुष्कर्म का दोषी ठहराया जा सकता है। यह स्थिति तब भी लागू होती है, जब पीड़िता उसकी पत्नी हो और उसकी उम्र 15 से 18 साल के बीच हो।
पत्नी होने का हवाला देकर आरोपी नहीं बच सकता
अदालत ने कहा कि आरोपी IPC की धारा 375 के अपवाद 2 का सहारा लेकर सजा से नहीं बच सकता। इस प्रावधान के तहत 15 साल से कम उम्र की न होने वाली पत्नी के साथ पति द्वारा बनाए गए यौन संबंध को उस समय दुष्कर्म नहीं माना जाता था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में आरोपी को इस अपवाद का लाभ नहीं दिया जा सकता।
जेल में बिताई अवधि को सजा में दी गई छूट
अदालत ने आरोपी को 5 फरवरी से 12 सितंबर 2012 तक जेल में बिताई गई अवधि का लाभ सजा में देने का आदेश दिया। यह अवधि मुकदमे की सुनवाई शुरू होने से पहले हिरासत में बिताया गया समय था।
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पीड़िता को मुआवजा दिलाने के लिए DLSA को मामला भेजा
अदालत ने पीड़िता को मुआवजा दिलाने के लिए मामले को जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (DLSA) के पास भेजने की भी सिफारिश की है। अतिरिक्त लोक अभियोजक सचिन कुलकर्णी ने बताया कि आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने पीड़िता समेत कुल सात गवाहों से पूछताछ की।