चीन ने हाल ही में भारत की सीमा पर दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनाने की परियोजना को मंजूरी दी है। जिस पर भारत में चिंता जताई जा रही है। इस परियोजना को लेकर विदेश मामलों के विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेवा ने कहा कि इसका पर्यावरण, मिट्टी और अरुणाचल व असम को मिलने वाले पानी पर बड़ा असर पड़ेगा।
चीन तिब्बत पठार के पूर्वी हिस्से में दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनाने जा रहा रहा है। यह बांध यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनेगा, जो भारत में अरुणाचल प्रदेश की ओर मुड़ती है। चीन की इस परियोजना पर विदेश मामलों के विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेवा का कहना है कि 'यारलुंग त्सांगपो' नदी के बांध पर भारत की नजर है, जिसे हम भारत में ब्रह्मपुत्र कहते हैं। यह एक बहुत बड़ी परियोजना है, और इसका पर्यावरण, मिट्टी और अरुणाचल व असम को मिलने वाले पानी पर बड़ा असर पड़ेगा।
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रोबिंदर सचदेवा ने आगे कहा कि यह बांध इतना विशाल है कि इसकी लागत 140 बिलियन डॉलर हो सकती है। इस तरह का बांध भारत के लिए कई समस्याएं पैदा कर सकता है। एक तो यह कि चीन पानी के प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है, जिससे हमें पीने और खेती के लिए कम पानी मिल सकता है। दूसरी बात, इससे मिट्टी और भूभाग पर भी असर पड़ सकता है।
अक्साई चिन क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा चीन
विदेश मामलों के विशेष सचदेवा ने इस दौरान हॉटन प्रांत में चीन द्वारा बनाई गई दो नई काउंटियों की भी बात की। उन्होंने कहा कि इससे चीन अक्साई चिन क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। हॉटन में पहले से 7 काउंटियां थीं और अब दो और जोड़ दी गई हैं। हर काउंटी की अपनी प्रशासनिक राजधानी होगी। यह साफ है कि चीन अपनी पकड़ और बुनियादी ढांचे को बढ़ा रहा है।
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भारत के साथ संबंध सुधारने को तैयार नहीं चीन
उन्होंने कहा कि इससे यह भी पता चलता है कि चीन भारत के साथ अपने संबंध सुधारने के लिए तैयार नहीं है। भारत के प्रति चीन का कुल मिलाकर रवैया यह है कि वे इस संघर्ष को स्थिर रखना चाहते हैं और इसे बढ़ाते रहना चाहते हैं।