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लाल किला-डालमिया मामलाः केंद्रीय संस्कृति मंत्री ने कहा, '5 रुपये तक की बात नहीं है'

Sun, 29 Apr 2018 02:45 PM IST
बीबीसी, हिंदी
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डालमिया भारत ग्रुप पहला उद्योग घराना बन गया है जिसने भारत के ऐतिहासिक विरासत लाल किले को गोद ले लिया है। कुछ मीडिया में आई खबरों में ये बताया जा रहा है कि इसके लिए सरकार और कंपनी के बीच करीब 25 करोड़ रुपये का अनुबंध हुआ है। हालांकि सरकार और कंपनी ने इस करार में पैसों के किसी प्रकार के लेन-देन की बात होने से इनकार किया है। केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने बीबीसी को बताया कि लाल किले को गोद दिया गया है। इसका मतलब ये नहीं है कि भारत सरकार के पास पैसे कम हैं।

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महेश शर्मा कहते हैं, "जनता की भागीदारी बढ़े इसके लिए 2017 में भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय ने पुरातत्व विभाग के साथ मिल कर एक योजना शुरू की जिसका नाम था 'अडॉप्ट अ हेरिटेज-अपनी धरोहर अपनी पहचान' यानी अपनी किसी धरोहर को गोद लें।" "इसके तहत कंपनियों को इन धरोहरों की सफाई, सार्वजनिक सुविधाएं देने, वाई-फाई की व्यवस्था करने और इससे गंदा होने से बचाने की जिम्मेदारी लेने के लिए कहा गया था।"

मीडिया में इस तरह की खबरें हैं कि ये 25 करोड़ रुपये का अनुबंध है। इस पर महेश शर्मा कहते हैं, "मुझे नहीं पता ये आंकड़ा कहां से आया क्योंकि पूरे समझौते में पैसों की कोई बात है ही नहीं। 25 करोड़ तो दूर की बात है, 25 रुपये क्या इसमें 5 रुपये तक की भी बात नहीं है। ना कंपनी सरकार को पैसे देगी ना ही सरकार कंपनी को कुछ दे रही है।" "जैसा पहले पुरातत्व विभाग टिकट देता था व्यवस्था वैसी ही रहेगी और बस पर्यटकों के लिए सुविधाएं बढ़ जाएंगी।"
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लाल किले में कंपनी क्या करेगी?

कई लोग इस बात को लेकर भी चिंता जता रहे हैं कि इस धरोहर के रखरखाव की जिम्मेदारी अब डालमिया ग्रुप की हो जाएगी। महेश शर्मा बताते हैं कि "इमारत के किसी हिस्से को कंपनी छू नहीं सकती है और इसके रखरखाव का काम पूरी तरह पहले की तरह पुरातत्व विभाग ही करेगा। और भविष्य में अगर इससे सीधे या परोक्ष तौर पर कोई फायदा होता भी है तो उस पैसे को एक अलग अकाउंट में रखा जाएगा और फिर इस पैसे को इमारत के रखरखाव पर ही खर्च किया जाएगा।"

कंपनी ने एक बयान जारी कर कहा है कि कंपनी ने आगामी पांच सालों के लिए दिल्ली के लाल किला और आंध्र प्रदेश के कड़प्पा स्थित गंडीकोटा किले को गोद लिया है। कंपनी सीएसआर इनिशिएटिव यानी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने के काम के जरिए इनका रखरखाव करने और पर्यटकों के लिए शौचालय, पीने का पानी, रोशनी की व्यवस्था करने और क्लॉकरूम आदि बनवाने के लिए अनुमानित 5 करोड़ प्रतिवर्ष खर्च करेगी।

बीबीसी ने बात की डालमिया कंपनी की प्रवक्ता पूजा मलहोत्रा से। पूजा का कहना है, "कंपनी ने पांच साल के लिए इस धरोहर को गोद लिया है। इसके तहत कंपनी पर्यटकों के लिए सार्वजनिक सुविधाओं का विकास करेगी और इसका फायदा पर्यटकों को ही पहुंचेगा।" "ये पूरा काम सीएसआर के तहत किया जाएगा।"

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क्या होता है सीएसआर?

डालमिया भारत
कंपनी ने इस बात से इनकार किया है कि इसमें पैसों से संबंधित कोई बात है। पूजा बताती हैं "ये बात गलत है कि इसके लिए सरकार कंपनी को या कंपनी सरकार को कुछ पैसे देने वाली है।" सीएसआर के जरिए बड़ी कंपनियां समाज और समाज में रहने वालों लोगों के लिए समाजसेवा के काम करती हैं और इसके लिए कंपनी अपने बजट का कुछ हिस्सा देती है।

सीएसआर मामलों के जानकार अभिनव सिन्हा कहते हैं, "कोई भी कंपनी हो वो काम करती है और उससे फायदा कमाती है तो ये माना जाता है कि वो समाज में जो चीजों हैं उनके इस्तेमाल से ही फायदा कर रही है।" "इस कारण सरकार की नीति कहती है कि कंपनी को इसे समाज को वापस लौटाना चाहिए। सरकारी नीति के अनुसार कंपनी अपने आखिरी तीन साल के फायदे के औसत का 2 फीसदी हिस्सा समाज के विकास के लिए खर्च करेगी।"

"ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर भी समाज ही का हिस्सा है और कंपनियां आज के दौर में इसे ब्रांडिंग के तौर पर इस्तेमाल कर रही हैं। हर कंपनी कहीं ना कहीं कोई ना कोई सामाजिक कार्य करती है, लेकिन जब ऐतिहासिक धरोहर की बात आती है तो इसके लिए सरकार से इजाजत लेनी होती है। इसमें कंपनी पैसे खर्च तो करती है लेकिन सरकार और कंपनी के बीच पैसों का लेन-देन नहीं होता।"

अभिनव बताते हैं कि कंपनी को बताना होता है कि जरूरत पड़ने पर वो इस काम में कितना खर्च करेगी और इसके लिए उसे एक अनुमानित संख्या देनी होती है। "शायद यही कारण है कि 25 करोड़ के आंकड़े पर चर्चा हो रही है।" दिल्ली में मौजूद लाल किले को मुगल बादशाह शाहजहां ने 17वीं शताब्दी में बनवाया था। अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से ही हर साल 15 अगस्त को देश के प्रधानमंत्री तिरंगा फहरा कर आजादी का जश्न मनाते हैं।
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