महेश शर्मा कहते हैं, "जनता की भागीदारी बढ़े इसके लिए 2017 में भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय ने पुरातत्व विभाग के साथ मिल कर एक योजना शुरू की जिसका नाम था 'अडॉप्ट अ हेरिटेज-अपनी धरोहर अपनी पहचान' यानी अपनी किसी धरोहर को गोद लें।" "इसके तहत कंपनियों को इन धरोहरों की सफाई, सार्वजनिक सुविधाएं देने, वाई-फाई की व्यवस्था करने और इससे गंदा होने से बचाने की जिम्मेदारी लेने के लिए कहा गया था।"
मीडिया में इस तरह की खबरें हैं कि ये 25 करोड़ रुपये का अनुबंध है। इस पर महेश शर्मा कहते हैं, "मुझे नहीं पता ये आंकड़ा कहां से आया क्योंकि पूरे समझौते में पैसों की कोई बात है ही नहीं। 25 करोड़ तो दूर की बात है, 25 रुपये क्या इसमें 5 रुपये तक की भी बात नहीं है। ना कंपनी सरकार को पैसे देगी ना ही सरकार कंपनी को कुछ दे रही है।" "जैसा पहले पुरातत्व विभाग टिकट देता था व्यवस्था वैसी ही रहेगी और बस पर्यटकों के लिए सुविधाएं बढ़ जाएंगी।"
लाल किले में कंपनी क्या करेगी?
कई लोग इस बात को लेकर भी चिंता जता रहे हैं कि इस धरोहर के रखरखाव की जिम्मेदारी अब डालमिया ग्रुप की हो जाएगी। महेश शर्मा बताते हैं कि "इमारत के किसी हिस्से को कंपनी छू नहीं सकती है और इसके रखरखाव का काम पूरी तरह पहले की तरह पुरातत्व विभाग ही करेगा। और भविष्य में अगर इससे सीधे या परोक्ष तौर पर कोई फायदा होता भी है तो उस पैसे को एक अलग अकाउंट में रखा जाएगा और फिर इस पैसे को इमारत के रखरखाव पर ही खर्च किया जाएगा।"
कंपनी ने एक बयान जारी कर कहा है कि कंपनी ने आगामी पांच सालों के लिए दिल्ली के लाल किला और आंध्र प्रदेश के कड़प्पा स्थित गंडीकोटा किले को गोद लिया है। कंपनी सीएसआर इनिशिएटिव यानी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने के काम के जरिए इनका रखरखाव करने और पर्यटकों के लिए शौचालय, पीने का पानी, रोशनी की व्यवस्था करने और क्लॉकरूम आदि बनवाने के लिए अनुमानित 5 करोड़ प्रतिवर्ष खर्च करेगी।
बीबीसी ने बात की डालमिया कंपनी की प्रवक्ता पूजा मलहोत्रा से। पूजा का कहना है, "कंपनी ने पांच साल के लिए इस धरोहर को गोद लिया है। इसके तहत कंपनी पर्यटकों के लिए सार्वजनिक सुविधाओं का विकास करेगी और इसका फायदा पर्यटकों को ही पहुंचेगा।" "ये पूरा काम सीएसआर के तहत किया जाएगा।"