नवनिर्वाचित 17वीं लोकसभा में रिकॉर्ड 30 फीसदी सांसद राजनीतिक परिवारों से हैं। राज्यों में, पंजाब और बिहार में वंशवादी सांसदों का अनुपात सबसे ज्यादा है। पार्टियों में, कांग्रेस सबसे अधिक वंशवादी है, लेकिन भाजपा भी पीछे नहीं रही है, जबकि सीपीएम सबसे कम वंशवादी है। दो राजनीतिक वैज्ञानिक ने राजनीतिक रुझानों और कारणों की जांच की है, जिसमें यह बात निकलकर सामने आई है।
हालांकि कांग्रेस पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दलों के प्रमुख राजवंश उम्मीदारों को जनता ने धूल चटाई है - बेशक इसमें अमेठी की अपनी जागीर से खुद राहुल गांधी भी शामिल हैं - वंशवादी कारक इस चुनाव में नजर आया है। साफ देखा जा सकता है कि वंशवादी राजनीति का चलन बढ़ गया है।
इंडियन एक्सप्रेस में छपे इस विशलेषण के मुताबिक 'राजवंश' उपाधि से उस उम्मीदवार या सांसद को परिभाषित किया गया है जिनका कोई रिश्तेदार, पहले या मौजूदा समय में प्रतिनिधित्व के किसी भी स्तर पर चुनावी जनादेश की सेवा में लगा है। इसमें ऐसे रिश्तेदार भी शामिल हैं जो पार्टी संगठनों में प्रमुख पदों पर आसीन हैं या सेवा कर चुके हैं।
2016 में कंचन चंद्रा द्वारा संपादित एक पुस्तक में दिखाया गया है कि "भारतीय सांसदों का एक चौथाई वंशवाद, औसतन 2004 और 2014 के बीच था...।" भारत के राष्ट्रीय और प्रांतीय निर्वाचित प्रतिनिधियों के सामाजिक प्रोफाइल के बारे में सीएनआरएस द्वारा प्रायोजित एसपीआईएनपीईआर (SPINPER) परियोजना के तहत, त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा (अशोक विश्वविद्यालय) और सीईआरआई (विज्ञान पीओ) के लिए शोधकर्ताओं की एक टीम द्वारा इकट्ठा किए गए आंकड़ों से और ज्यादा बड़ी संख्या उभर कर सामने आती है। आंकड़ों से पता चलता है कि 2019 में, सभी लोकसभा सांसदों में से 30 फीसदी राजनीतिक परिवारों से संबंधित हैं, जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
बड़े राज्यों में, जहां राजवंशों का अनुपात राष्ट्रीय औसत से ऊपर है, बढ़ते क्रम में इस प्रकार है - राजस्थान (32 फीसदी), उड़ीसा (33 फीसदी), तेलंगाना (35 फीसदी), आंध्र प्रदेश (36 फीसदी), तमिलनाडु (37 फीसदी), कर्नाटक (39 फीसदी), महाराष्ट्र (42 फीसदी), बिहार (43 फीसदी) और पंजाब (62 फीसदी)। जाहिर तौर पर यह घटना भौगोलिक रूप से हर जगह फैली हुई है।