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क्या महिलाओं को अपराध से मुक्ति दिलाना वाकई मुश्किल? नहीं, तो यह पढ़ लीजिए?

Thu, 25 Jan 2018 06:39 PM IST
हरेन्द्र सिंह मोरल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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एक दिन बाद हम देश के गणतंत्र की 69वीं वर्षगांठ मनाने में मशगूल होंगे। केंद्र सरकार ने भी इस जश्न को भव्य बनाने की पूरी तैयारी कर ली है, इसके लिए आसियान से जुड़े दस देशों के राष्ट्राध्यक्षों को न्यौता भेजा गया था, जो दिल्‍ली पहुंच चुके हैं। एक तरह से यह गण के तंत्र का जश्न है, जिसे हर साल की तरह पूरे धूमधाम से मनाया जाएगा। लेकिन क्या वाकई में देश जश्न के हालात में है, तब जब इस गण का एक हिस्सा यानि महिलाएं आजादी के सत्तर साल बाद भी अभी तक तमाम रूढ़ियों और बंधनों से आजाद नहीं हो सकी हैं।

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हर घंटे देश के किसी न किसी हिस्से से उनके साथ बलात्कार और हत्या जैसे संगीन अपराधों की खबर आपको दहलाती रहती हैं, इन अपराधों से न महिलाएं बच सकी हैं न चंद दिनों पहले इस दुनिया में आई मासूम बच्चियां और न ही अस्सी साल की कोई बूढ़ी मां।

देशभर के अपराध का रिकार्ड रखने वाले राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों की संख्या पिछले दस सालों में दोगुनी हो चुकी है, हर घंटे देश में महिलाओं के साथ कम से कम 25 अपराध सामने आते हैं।
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याद रहे, ये वो आंकड़े हैं जो कानून के बही खातों में दर्ज होते हैं, दर्ज न हो पाने वाले अपराधों की संख्या का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। खास बात ये है कि हर छोटे बड़े मौकों पर तमाम राज्य और केंद्र सरकार महिलाओं की सुरक्षा और उनके प्रति होने वाले अपराधों की रोकथाम के बड़े-बड़े दावों के साथ अपनी अपनी बात रखती हैं लेकिन हकीकत में होता कुछ नहीं।

ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या वाकई महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों को रोकना वाकई मुश्किल है, या ये सरकारों की प्राथमिकता में ही नहीं है। इससे पहले की आप किसी निष्कर्ष पर पहुंचे मैं खुद का एक अनुभव आपके साथ साझा करना चाहता हूं, जिससे ये समझने में थोड़ी आसानी होगी कि महिलाओं के प्रति अपराध रोकना क्या वाकई मुश्किल है।

महिलाओं के मामले में जम्‍मू कश्मीर से सीख ले सकते हैं दूसरे राज्य

साल 2014 की गर्मियों में अमर उजाला में ज्वाइनिंग के दौरान मुझे पहली नियुक्ति मिली जम्‍मू में। मन में तमाम शंकाएं-आशंकाएं लिए मैं जम्‍मू पहुंचा, जहां पहली ड्यूटी ही नाइट शिफ्ट की मिली।

जम्‍मू जाने से पहले वहां के हालात को लेकर जो पहली तस्वीर दिमाग में बसी थी वो आतंकवाद से जूझते देश के एक प्रमुख हिस्से और संगीनों के साये में रहने वाले एक शहर की थी। खैर बात नाइट शिफ्ट की हो रही ‌थी, तो मैं ऑफिस से ड्यूटी खत्म कर रात 12 बजे के बाद ही घर के लिए निकलता था, कई बार तो निकलते निकलते 2 भी बज जाते ‌थे।

ऑफिस से घर की दूरी बामुश्किल 2 किलोमीटर रही होगी इसलिए पैदल ही आना जाना होता था, 15-20 मिनट के इस सफर में जो बात मुझे सबसे ज्यादा चौंकाती थी वो थी जम्‍मू की सड़कों पर आधी रात के बाद बेखौफ आती जाती महिलाओं की। जो कई बार दो तीन के झुंड में होती थीं तो कई बार बिल्कुल अकेले ही मेरी तरह ड्यूटी खत्‍म कर घर लौट रही होती थीं।

सोचकर ही दिमाग चकरा उठता था कि क्या देश के किसी अन्य हिस्से, खासकर यूपी, दिल्‍ली या अन्य जगह यह संभव भी है। जम्‍मू की उन सड़कों पर तो कई बार महिलाएं शादी ब्याह से भी आधी आधी रात को अकेले ही घर के लिए निकल लेती थीं, इसके‌ लिए उन्हें परिवार के पुरुष सदस्य के सहारे की कोई जरूरत महसूस नहीं होती थी।

क्या हम उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्‍ली या मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के बारे में महिलाओं की इस आजादी को लेकर सोच सकते हैं। बात सिर्फ रात की ही नहीं थी जम्‍मू में महिलाएं सुबह, दोपहर, शाम ‌किसी भी समय बेरोकटोक कहीं भी आने जाने को आजाद हैं।
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जम्‍मू में कहीं भी बेखौफ आने जाने के लिए आजाद हैं महिलाएं

अब एक और मजेदार बात दे‌खिए, जम्‍मू में मेरी नियुक्ति पांच महीने की रही, इस दौरान मैंने महिलाओं से रेप की कुल 'तीन खबरें' अखबारों में देखी, चेन लूट और मर्डर जैसी खबर तो भूल ही जाइये। न ही दहेज हत्या का कोई मामला यहां जल्दी से नजर आता है। हां महिलाओं में आपसी मारपीट की खबर कई बार जरूर अखबार के किसी कोने में देखने को मिल जाती थी।

अब सवाल ये, कि क्या जम्‍मू में वाकई महिलाओं के खिलाफ अपराध नहीं होते या होते हैं लेकिन दर्ज नहीं होते। तो आप पहली बात पर यकीन कर सकते हैं, जम्‍मू ही नहीं कश्मीर और लद्दाख में भी महिलाओं के प्रति अपराध की संख्या नगण्य है।

अब दूसरी बात, आखिर इसकी वजह क्या है? इस सवाल और मेरी उत्सुकता का जवाब दिया जम्मू के एक थाने के इंस्पेक्टर ने। शहर के गांधीनगर थाने के इंस्पेक्टर राजाराम बंडोत्रा से इस बारे में एक बार बात हुई, हंसमुख मिजाज राजाराम ने बताया कि साहब महिलाओं के प्रति अपराध सीधे-सीधे एक सामाजिक कुरीति है जो रियासत (जम्‍मू कश्मीर के लोग राज्य को इसी नाम से पुकारते हैं) में बिल्कुल नहीं है।

यहां शुरूआत से ही महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया गया है, इसके अलावा घर की संस्कृति में भी बच्चों को महिलाओं के प्रति सम्मान करना सिखाया जाता है। वो बताते हैं कि आपको यहां भ्रूण हत्या के मामले ना के बराबर दिखाई देंगे, दहेज को लेकर भी कोई वारदात कभी आपको यहां देखने को नहीं मिलेगी। दूसरी बात जो उन्होंने बताई, वो ये थी कि महिलाओं के प्रति अपराध के मामले में पुलिस भी यहां काफी तेजी से कार्रवाई करती है, राज्य में कई जगह महिला थाने में भी बने हुए हैं, इसके अलावा कई काउंसलिंग सेंटर भी हैं जहां महिलाओं से जुड़े मुद्दों को वार्ता से सुलझाया जाता है।

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि महिलाएं यहां सब जगह आगे ही हैं, राजनीतिक और नौकरियों के हिसाब से आज भी उनकी सहभागिता काफी कम है लेकिन अपराध के मामले में वह यहां चैन से रह सकती हैं।

खैर, ये मेरा अनुभव जम्‍मू को लेकर था जो ये बताने के लिए काफी है कि महिलाओं के प्रति अपराध खत्म या कम होना कोई ऐसा बड़ा मामला भी नहीं है।
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