चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पीएम मोदी तस्वीरों में हाथ मिलाते और साथ में मुस्कुराते भले ही दिखें, लेकिन ड्रैगन की भारत के प्रति खुन्नस जगजाहिर है। चीन किसी भी कीमत पर नहीं चाहता कि भारत आर्थिक या समारिक क्षेत्र में उससे जरा भी आगे निकले। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने एढ़ी से चोटी का जोर लगा लिया, अमेरिका ने खुलेतौर पर भारत के पक्ष में आवाज बुलंद की, 48 में 41 देश भारत के पक्ष में राय बनाते दिखे, लेकिन ड्रैगन टस से मस नहीं हुआ। परमाणु अप्रसार संधि में भारत के दस्तखत न होने का हवाला देकर चीन कुछ देशों को भारत के खिलाफ भड़काने में सफल रहा और भारत से हाथ में आती दिख रही बाजी पलट गई।
दरअसल, भारत की खिलाफत करने वाले चीन की असली खुन्नस कुछ और ही है। इस खुन्नस के तार जुड़े हैं अमेरिका से, मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजाइम (एमटीसीआर) से।
पहली वजह है कि 48 देशों वाले परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत नहीं है और चिरप्रतिद्वंदी चीन है।
दूसरी और असली वजह है- भारत मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजाइम (एमटीसीआर) का सदस्य बन चुका है, लेकिन चिरप्रतिद्वंदी चीन अब तक इस उपलब्धि से दूर है।
माजरा यह है कि चीन भी एमटीसीआर का सदस्य बनना चाहता था। उसने 2004 में एमटीसीआर में शामिल होने के लिए दावेदारी पेश की थी। लेकिन समूह के सदस्यों को चीन की मंशा ठीक नहीं लगी। अमेरिका नहीं चाहता था कि चीन एमटीसीआर में शामिल हो। अमेरिका की नॉन पार्टीशन ऑर्गनाइजेशन आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन ने एमटीसीआर में शामिल होने को लेकर चीन की योग्यता पर सवाल उठाए गए थे।