मौसम विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के मध्य और मध्य प्रदेश के उत्तरी ऊपरी हिस्से समेत बुंदेलखंड के इलाके में मौसम विभाग ने चेतावनी जारी करते हुए तेज बारिश की आशंका पहले ही जताई थी। महापात्रा कहते हैं कि लेकिन बीते दो दिनों से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और आसपास के इलाकों में जिस तरीके से तेज चमकती हुई बिजली और कड़कते हुए बादलों की जानकारियां सामने आ रही हैं इसके पीछे कुछ खास वजहें ही निकल कर सामने आई हैं। उनका कहना है कि इन इलाकों में साइक्लोनिक सर्कुलेशन की वजह से "क्लूमिलोनिंबस क्लाउड" बने हैं। ऐसे बादलों से न सिर्फ तेज बारिश होती है बल्कि बिजली के चमकते और कड़कने की भी सबसे ज्यादा संभावनाएं बनी रहती हैं। इसी साइक्लोनिक सर्कुलेशन की वजह से इस समूचे इलाके में "टॉल क्लाउड" बन गए। इन बादलों की लंबाई कितनी ज्यादा हो गई की एक एक बादल जुड़ते जुड़ते 15 किलोमीटर के करीब का हो गया। वह कहते हैं कि जब छोटे बादलों से पंद्रह पंद्रह किलोमीटर के टॉल क्लाउड बनने लगे तो इनका घनत्व भी बढ़ने लगा और आपस में टकराने पर न सिर्फ तेज बिजलियां चमकने लगी और की गड़गड़ाहट के साथ तेज बारिश भी शुरू हो गई।
लगातार हो रही बारिश और बिजली के चमकने और बादलों के कड़कने पर मौसम विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा कहते हैं कि दरअसल बादलों की एक उम्र भी होती है। उनका कहना है कि सामान्यत मानसून के दिनों में एक बादल की उम्र 3 घंटे या उसके आसपास की होती है। लेकिन जब छोटे-छोटे बादलों के टुकड़े बड़े बादलों के तौर पर टॉल क्लाउड में बदल जाते हैं तो इन बादलों की उम्र भी 3 घंटे से बढ़कर काफी लंबी हो जाती है। उनका कहना है कि अमूमन मानसून के दौर में यह बादलों के टुकड़े बरसते हुए अपनी उम्र पूरी करते हुए आगे निकल जाते हैं। लेकिन जब साइक्लोनिक सर्कुलेशन बनता है तो यह छोटे-छोटे बादल बड़े-बड़े टुकड़ों में एक साथ जुड़ते हुए चले जाते हैं। जिनकी लंबाई आधा किलोमीटर से लेकर 15 किलोमीटर या उससे भी कुछ ज्यादा हो जाती है वह फिर ऐसे ही तेज बारिश के साथ थंडरस्टॉर्म पैदा करते हैं। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जब यह बादल आपस में जुड़ते चले जाते हैं तो इनका घनत्व भी बढ़ता जाता है। उनका कहना है कि इसी बादलों के आपस में जुड़ने की प्रक्रिया और बढ़ते घनत्व के चलते इनके आपस में टकराने पर बिजली भी चमकती है और बहुत तेज आवाज भी होती है। मौसम विभाग का मानना है कि उत्तर प्रदेश के मध्य पूर्वी और दक्षिण के हिस्से में इस वक्त जो मौसम बन रहा है वह साइक्लोनिक सर्कुलेशन की वजह से जुड़ते हुए बादलों और उसके बढ़ते हुए घनत्व के चलते ही आगे बढ़ रहा है।
मौसम विभाग के वैज्ञानिकों के मुताबिक अमूमन 15 किलोमीटर के लंबे बादलों का पैच बहुत कम बनता है। विभाग के महानिदेशक बताते हैं कि मानसून के दौरान बादलों की आवाजाही तो लगी रहती है लेकिन इन बादलों की लंबाई इतनी नहीं होती है। लेकिन साइक्लोनिक सर्कुलेशन में बने हुए लंबी दूरी के बदले अमूमन न सिर्फ ज्यादा बारिश करते हैं बल्कि बादलों के टकराने के दौरान थंडरस्टॉर्म पैदा करते हैं। वह कहते हैं कि बीते दो दिनों से उत्तर प्रदेश में जिस तरीके से थंडरस्टॉर्म बना हुआ है वह मानसून में पैदा हुए साइक्लोनिकसर्कुलेशन की मुख्य वजह से ही बना हुआ है। मौसम विभाग का अनुमान है कि मंगलवार को भी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में इसी तरीके की मौसमी परिस्थितियां बनी रहेंगी। इसलिए विभाग में संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों के माध्यम से लोगों को सतर्क रहने के लिए दिशा निर्देश भी जारी किए हैं।
उत्तर प्रदेश राजधानी लखनऊ पास के इलाकों में हुई बारिश को लेकर मौसम विभाग ने लगातार अलर्ट भी जारी किया था। मौसम विभाग के मुताबिक अब जिस तरीके की साइक्लोनिक सर्कुलेशन में परिस्थितियां बनी हुई है उसके लिहाज से प्रयागराज के साथ साथ बुंदेलखंड के इलाके में तेज बारिश की आशंका बनी हुई है। मौसम विभाग के मुताबिक बीते दो दिनों में जिस तरीके से उत्तर प्रदेश के मध्य इलाके में बारिश हुई है वहां पर अब बारिश का असर कम होना शुरू हो जाएगा। वही लगातार हुई बारिश और चमक रही बिजली को लेकर उत्तर प्रदेश के लोगों में भय और दहशक का माहौल बना रहा। लोगों का यह तक कहना था कि जिस तरीके से बिजलियां चमकी और बादलों की गड़गड़ाहट हुई वह उन्होंने अपने जीवन में इससे पहले कभी नहीं सुनी थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि जिन परिस्थितियों के चलते ऐसे हालात बने वह भी सामान्य मानसून की परिस्थितियों में नहीं बनते हैं। लेकिन मानसून में अमूमन साइक्लोनिक सर्कुलेशन की वजह से "क्लूमिलोनिंबस क्लाउड" बन जाते हैं।